श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 50-51
 
 
श्लोक  4.30.50-51 
यो जायमान: सर्वेषां तेजस्तेजस्विनां रुचा ।
स्वयोपादत्त दाक्ष्याच्च कर्मणां दक्षमब्रुवन् ॥ ५० ॥
तं प्रजासर्गरक्षायामनादिरभिषिच्य च ।
युयोज युयुजेऽन्यांश्च स वै सर्वप्रजापतीन् ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
जन्म लेने के बाद, दक्ष ने अपनी शानदार शारीरिक आभा से दूसरों को मात दे दी। चूँकि वे फलदायी क्रियाओं में बहुत कुशल थे, इसलिए उन्हें दक्ष नाम दिया गया, जिसका अर्थ है "बहुत कुशल"। इसलिए भगवान ब्रह्मा ने जीवों को उत्पन्न करने और उनकी देखभाल करने के काम में दक्ष को नियुक्त किया। समय के साथ, दक्ष ने अन्य प्रजापतियों (पूर्वजों) को भी उत्पत्ति और पोषण की प्रक्रिया में लगा दिया।
 
After his birth, Daksha, due to his unique physical radiance, overshadowed the physical radiance of all others. Since he was very adept in performing desired tasks, he was named Daksha. Therefore, Brahma put him to the task of creating and rearing living beings. When the time came, Daksha also appointed other Prajapatis to the task of creation and rearing.
तात्पर्य
दक्ष भगवान ब्रह्मा के समान ही शक्तिशाली हो गए थे। परिणामस्वरूप, भगवान ब्रह्मा ने उन्हें जनसंख्या उत्पन्न करने में लगा दिया। दक्ष बहुत प्रभावशाली और समृद्ध थे। अपनी बारी में, दक्ष ने मरीचि के नेतृत्व में अन्य प्रजापतियों को नियुक्त किया। इस तरह ब्रह्माण्ड की जनसंख्या बढ़ती गई।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध चार के अंतर्गत तीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)