श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.30.5 
सुपर्णस्कन्धमारूढो मेरुश‍ृङ्गमिवाम्बुद: ।
पीतवासा मणिग्रीव: कुर्वन्वितिमिरा दिश: ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
गरुड़ के कंधों पर विराजमान भगवान् मेरु पर्वत की चोटी पर विश्राम कर रहे बादल समान लग रहे थे। भगवान् का दिव्य शरीर आकर्षक पीताम्बर से ढका था और उनकी गर्दन कौस्तुभ मणि से सजी थी। भगवान् के शरीर से निकलते तेज से ब्रह्माण्ड का सारा अंधेरा दूर हो रहा था।
 
Seated on Garuda's shoulder, the Lord appeared like a cloud on the peak of Mount Meru. The Lord's divine body was covered with an attractive yellow cloth and His neck was adorned with the Kaustubha Mani. The Lord's bodily radiance was dispelling all the darkness of the universe.
तात्पर्य
जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (मध्य 22.31) में कहा गया है:

कृष्ण - सूर्य-सम; माया हय अंधकार

याहाँ कृष्ण, ताहाँ नाहि मायारा अधिकार

प्रभु बिलकुल तेजस्वी सूर्य की तरह हैं। परिणामस्वरूप, जब भी भगवान सर्वव्यापी व्यक्तित्व होते हैं, तब वहाँ अंधकार या अज्ञान नहीं हो सकता। वस्तुतः यह अंधकारमय ब्रह्मांड सूर्य द्वारा प्रकाशित किया जाता है, लेकिन सूर्य और चंद्रमा केवल सर्वोच्च भगवान के शारीरिक तेज को दर्शाते हैं। भगवद् गीता (7.8) में भगवान कहते हैं, प्रभास्मि शशि-सूर्ययोः: "मैं सूर्य और चंद्र दोनों की प्रकाशमान ऊर्जा हूँ।" निष्कर्ष यह है कि सभी जीवन की उत्पत्ति सर्वोच्च भगवान व्यक्तित्व का शारीरिक तेज है। इसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता में भी की गई है: यस्य प्रभा प्रभवतो जगद-अण्‍डा-कोटि। सर्वोच्च भगवान व्यक्तित्व के शारीरिक तेज द्वारा प्रकाशित होने के कारण, सब कुछ सभी अंधकारों से मुक्त है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)