ते च ब्रह्मण आदेशान्मारिषामुपयेमिरे ।
यस्यां महदवज्ञानादजन्यजनयोनिज: ॥ ४८ ॥
अनुवाद
ब्रह्माजी के आदेश से सभी प्रचेता उस लड़की को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। इस कन्या का नाम मारीषा था। जब दक्ष को पता नहीं था की मारीषा ब्रह्माजी की पुत्री हैं, तब भी उसने मारीषा का अनादर किया। फिर ब्रह्माजी के आदेश के अनुसार, दक्ष को मारीषा के गर्भ से जन्म लेना पड़ा। जैसे ही दक्ष को जन्म हुआ, उसे मरना पड़ा और एक बार फिर उसने जन्म लिया।
On Brahma's orders, all the Prachetas accepted that girl as their wife. Brahma's son Daksha was born from the womb of this girl. Daksha had to take birth from Marisha's womb because he had disobeyed and disrespected the orders of Mahadevji (Shivaji). As a result, he had to give up his body twice.
तात्पर्य
इस संबंध में शब्द 'महा-अवज्ञानात्' महत्वपूर्ण है। राजा दक्ष भगवान् ब्रह्मा के पुत्र थे; अतः पिछले जन्म में वे ब्राह्मण थे। लेकिन भगवान् महादेव का अपमान अथवा अनादर करके एक अब्राह्मण का व्यवहार करने के कारण, उन्हें एक क्षत्रिय के वीर्य से जन्म लेना पड़ा- अर्थात् वे प्रचेताओं के पुत्र बने। इतना ही नहीं, भगवान् शिव का अपमान करने के कारण, उन्हें एक स्त्री के गर्भ से जन्म लेने का कष्ट उठाना पड़ा। दक्ष-यज्ञ क्षेत्र में, वे एक बार भगवान् शिव के सेवक वीरभद्र द्वारा मारे गए थे। क्योंकि वह पर्याप्त नहीं था, उन्होंने फिर से मारीषा के गर्भ से जन्म लिया। दक्ष-यज्ञ और वहाँ की विनाशकारी घटनाओं के अंत में, दक्ष ने भगवान् शिव को अपनी प्रार्थना समर्पित की। हालाँकि उन्हें अपने शरीर को त्यागना पड़ा और एक क्षत्रिय के वीर्य से गर्भवती हुई एक स्त्री के गर्भ से जन्म लेना पड़ा, पर उन्हें भगवान् शिव की कृपा से सभी वैभव प्राप्त हुए। ये भौतिक प्रकृति के सूक्ष्म नियम हैं। दुर्भाग्य से, इस आधुनिक युग में लोगों को पता नहीं है कि ये नियम कैसे काम कर रहे हैं। आत्मा की अनंतता और इसके पुनर्जन्म के बारे में कोई जानकारी न होने के कारण, वर्तमान युग की जनसंख्या बहुत अधिक अज्ञान में है। इस वजह से, भागवतम (१.१.१०) में कहा गया है, मंदाः सुमंद-मतयो मंद-भाग्या ह्य उपद्रुताः: कलियुग के इस युग में कुल जनसंख्या बहुत खराब, आलसी, दुर्भाग्यशाली और भौतिक परिस्थितियों से परेशान है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥