श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  4.30.45 
ततोऽग्निमारुतौ राजन्नमुञ्चन्मुखतो रुषा ।
महीं निर्वीरुधं कर्तुं संवर्तक इवात्यये ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
हे महाराज, प्रलय के समय में भगवान शिव क्रोध में आकर अपने मुख से अग्नि और वायु छोड़ते हैं। प्रचेताओं ने भी पृथ्वी की सतह को पूरी तरह से वृक्षहीन बनाने के लिए अपने मुंह से अग्नि और वायु को छोड़ा था।
 
O King, at the time of destruction, Lord Shiva becomes angry and releases fire and air from his mouth. The Prachetas also released fire and air from their mouths to make the earth completely treeless.
तात्पर्य
इस श्लोक में विदुर को राजन कहकर सम्बोधित किया गया है, जिसका अर्थ है "हे राजन"। इस संदर्भ में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर टिप्पणी करते हैं कि एक धीर कभी क्रोधित नहीं होता क्योंकि वह हमेशा भक्ति सेवा में स्थित होता है। उन्नत भक्त अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर सकते हैं; इसलिए एक भक्त को राजन कहकर संबोधित किया जा सकता है। एक राजा नागरिकों के बीच विभिन्न तरीकों से नियंत्रण करता है और शासन करता है; इसी तरह, जो कोई अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता है वह अपनी इंद्रियों का राजा है। वह एक स्वामी या गोस्वामी है। इसलिए स्वामी और गोस्वामी को कभी-कभी महाराज या राजा के रूप में संबोधित किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)