श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.30.44 
अथ निर्याय सलिलात्प्रचेतस उदन्वत: ।
वीक्ष्याकुप्यन्द्रुमैश्छन्नां गां गां रोद्धुमिवोच्छ्रितै: ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात सर्व प्रचेते समुद्र के जल से बाहर निकल गए। तभी उन्होंने देखा कि पृथ्वी पर सारे वृक्ष इतने बड़े हो चुके हैं कि ऐसा लग रहा था मानो वे स्वर्ग के मार्ग को रोकना चाहते हैं। इन वृक्षों ने सारे पृथ्वी के भूभाग को ढक रखा था। उस समय प्रचेते बहुत क्रोधित हुए।
 
After that all the Prachetas came out of the ocean water. Then they saw that all the trees on the earth had grown very tall as if they wanted to block the way to heaven. These trees had covered the entire surface of the earth. At that time Prachetas became very angry.
तात्पर्य
राजा प्राचीनबर्हिषत अपने पुत्रों द्वारा तपस्या और कठोर तपस्या पूर्ण होने के बाद उनके आने से पहले ही अपना राज्य छोड़ कर चले गए। परमेश्‍वर के व्‍यक्तित्‍व ने प्रचेता पुत्रों को आज्ञा दी कि वे पानी से बाहर आएँ और अपने पिता के राज्य में जाकर उसकी देखरेख करें। हालाँकि, जब वे बाहर आए तो उन्‍होंने पाया कि राजा की अनुपस्थिति के कारण सब कुछ उपेक्षित हो चुका है। उन्‍होंने सबसे पहले देखा कि खाद्यान्न उत्‍पादन नहीं किया जा रहा है और कोई कृषि संबंधी कार्य-कलाप नहीं हो रहे हैं। वास्‍तव में, पृथ्‍वी की सतह ऊँचे-ऊँचे वृक्षों से भरी हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे वृक्ष लोगों को अंतरिक्ष में जाने और स्‍वर्गीय राज्‍यों तक पहुँचने से रोकने के लिए दृढ़संकल्‍प हैं। इस तरह से पृथ्‍वी की सतह को ढके हुए देखकर प्रचेतागण बहुत क्रोधित हुए। वे चाहते थे कि भूमि को फसलों के लिए साफ किया जाए।

यह सत्‍य नहीं है कि जंगल और वृक्ष बादल और वर्षा को आकर्षित करते हैं क्‍योंकि हमें समुद्र पर बारिश होती हुई मिलती है। मनुष्‍य जंगलों को साफ करके और भूमि को कृषि के उद्देश्‍य के लिए बदलकर पृथ्‍वी की सतह पर किसी भी स्‍थान पर रह सकते हैं। लोग गायें पाल सकते हैं और इस तरह से सभी आर्थिक समस्‍याओं का समाधान हो सकता है। बस मनुष्‍य को अनाज उत्‍पादन और गायों की देखभाल का कार्य करने की आवश्‍यकता है। जंगलों में उपलब्‍ध लकड़ी का उपयोग झोंपड़ियाँ बनाने में किया जा सकता है। इस तरह से मानवता की आर्थिक समस्‍या का समाधान किया जा सकता है। इस समय पूरे विश्‍व में बहुत सी खाली भूमियाँ हैं और यदि इनका उचित उपयोग किया जाए तो भोजन की कोई कमी नहीं पड़ेगी। जहां तक बारिश का संबंध है, यज्ञ करने से ही वर्षा आती है। जैसा कि भगवद गीता (3.14) में कहा गया है:

अन्नाद् भवन्ति भूतानि

पर्जन्याद् अन्न-सम्भवः

यज्ञाद् भवति पर्जन्यो

यज्ञः कर्म-समुद्भवः

“सभी जीवों का पोषण अन्‍न से होता है जो वर्षा से उत्‍पन्‍न होता है। वर्षा यज्ञ [बलिदान] करने से होती है और यज्ञ निर्धारित कर्तव्‍यों से उत्‍पन्‍न होता है।” यज्ञ करने से मनुष्‍य को पर्याप्‍त वर्षा और फसल प्राप्त होगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)