फिर भी, भक्ति सेवा में हर कोई भगवान को आवश्यक प्रार्थना कर सकता है। हर कोई एक सापेक्ष स्थिति में स्थित है, और कोई भी भगवान की महिमा करने में पूर्ण नहीं है। भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव से लेकर स्वयं तक, हर कोई सर्वोच्च भगवान का सेवक है। हम सभी अपने स्वयं के कर्म के अनुसार सापेक्ष स्थितियों में स्थित हैं। फिर भी हम में से प्रत्येक प्रभु के गौरव की जितनी सराहना कर सकता है, उतना ही हृदय और आत्मा से प्रार्थना कर सकता है। वह हमारी पूर्णता है। यहां तक कि जब कोई अस्तित्व के सबसे अंधेरे क्षेत्र में होता है, तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार प्रभु से प्रार्थना करने की अनुमति दी जाती है। इसलिए भगवान ने भगवद-गीता (9.32) में कहा है:
माँ हि पार्थ व्यापाश्रित्य
ये ''पि स्युः पाप-योनायः
स्त्रियो वैश्यास्ताथा शूद्राः
ते ''पि यान्ति पराँ गतिम्
“हे पृथा के पुत्र, जो लोग मुझमें शरण लेते हैं, भले ही वे निम्न जन्म के हों - स्त्रियाँ, वैश्य [व्यापारी], साथ ही शूद्र [श्रमिक] - वे सर्वोच्च गंतव्य तक पहुँच सकते हैं।”
यदि कोई गंभीरता से भगवान के चरण कमलों को स्वीकार कर लेता है, तो वह भगवान की कृपा से और भगवान के सेवक की कृपा से शुद्ध हो जाता है। इसकी पुष्टि शुकदेव गोस्वामी करते हैं: ये ''न्ये च पापा यद-अपश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः (भा. 2.4.18)। जो भगवान के सेवक, आध्यात्मिक गुरु के प्रयास द्वारा भगवान के चरण कमलों के नीचे लाया जाता है, वह निश्चित रूप से तुरंत शुद्ध हो जाता है, चाहे वह कितना भी नीच हो। वह भगवान के पास वापस, घर लौटने के योग्य हो जाता है।
