श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  4.30.41 
मनु: स्वयम्भूर्भगवान् भवश्च
येऽन्ये तपोज्ञानविशुद्धसत्त्वा: ।
अद‍ृष्टपारा अपि यन्महिम्न:
स्तुवन्त्यथो त्वात्मसमं गृणीम: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवान, तप और ज्ञान से सिद्धि पाए हुए महान योगी और शुद्ध सत्व में स्थित लोग, यहाँ तक कि मनु, ब्रह्मा और शिव जैसे महापुरुष भी आपकी महिमा और शक्तियों को पूरी तरह से नहीं समझ पाते हैं। फिर भी, वे अपनी क्षमता के अनुसार आपकी प्रार्थना करते हैं। उसी तरह, हम भी, जो इन महापुरुषों से बहुत कम हैं, अपनी क्षमता के अनुसार प्रार्थना कर रहे हैं।
 
O Lord, great Yogis who have attained perfection due to penance and knowledge and people situated in pure Sattva, along with great men like Manu, Brahma and Shiva, are unable to understand your glory and powers completely. Still, they pray to you according to their capacity. Similarly, we, despite being much smaller than these great men, are praying according to our capacity.
तात्पर्य
भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव, मनु (मानवता के पिता), महान साधु पुरुष और साथ ही महान ऋषि जो तपस्या और संन्यास के साथ-साथ भक्ति सेवा के द्वारा खुद को पारलौकिक मंच पर स्थापित करते हैं, सर्वशक्तिमान भगवान के ज्ञान के मुकाबले अपूर्ण होते हैं। यही स्थिति इस भौतिक दुनिया के भीतर किसी की भी है। कोई भी किसी भी चीज में, और निश्चित रूप से ज्ञान में, सर्वोच्च भगवान के बराबर नहीं हो सकता है। परिणामस्वरूप, सर्वोच्च भगवान के प्रति किसी की भी प्रार्थना कभी पूर्ण नहीं होती है। सर्वोच्च भगवान के पूर्ण गौरव को मापना संभव नहीं है, जो असीमित हैं। यहां तक कि स्वयं भगवान अपने अवतार अनंत, या शेष के रूप में, उनके अपने गौरव का वर्णन नहीं कर सकते हैं। यद्यपि अनंत के कई हजारों चेहरे हैं और वह कई, कई वर्षों से भगवान की स्तुति करते रहे हैं, फिर भी वह प्रभु के गौरव की सीमा नहीं पा सके। इस प्रकार सर्वोच्च भगवान की पूर्ण क्षमताओं और महिमा का अनुमान लगाना संभव नहीं है।

फिर भी, भक्ति सेवा में हर कोई भगवान को आवश्यक प्रार्थना कर सकता है। हर कोई एक सापेक्ष स्थिति में स्थित है, और कोई भी भगवान की महिमा करने में पूर्ण नहीं है। भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव से लेकर स्वयं तक, हर कोई सर्वोच्च भगवान का सेवक है। हम सभी अपने स्वयं के कर्म के अनुसार सापेक्ष स्थितियों में स्थित हैं। फिर भी हम में से प्रत्येक प्रभु के गौरव की जितनी सराहना कर सकता है, उतना ही हृदय और आत्मा से प्रार्थना कर सकता है। वह हमारी पूर्णता है। यहां तक कि जब कोई अस्तित्व के सबसे अंधेरे क्षेत्र में होता है, तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार प्रभु से प्रार्थना करने की अनुमति दी जाती है। इसलिए भगवान ने भगवद-गीता (9.32) में कहा है:

माँ हि पार्थ व्यापाश्रित्य

ये ''पि स्युः पाप-योनायः

स्त्रियो वैश्यास्ताथा शूद्राः

ते ''पि यान्ति पराँ गतिम्

“हे पृथा के पुत्र, जो लोग मुझमें शरण लेते हैं, भले ही वे निम्न जन्म के हों - स्त्रियाँ, वैश्य [व्यापारी], साथ ही शूद्र [श्रमिक] - वे सर्वोच्च गंतव्य तक पहुँच सकते हैं।”

यदि कोई गंभीरता से भगवान के चरण कमलों को स्वीकार कर लेता है, तो वह भगवान की कृपा से और भगवान के सेवक की कृपा से शुद्ध हो जाता है। इसकी पुष्टि शुकदेव गोस्वामी करते हैं: ये ''न्ये च पापा यद-अपश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः (भा. 2.4.18)। जो भगवान के सेवक, आध्यात्मिक गुरु के प्रयास द्वारा भगवान के चरण कमलों के नीचे लाया जाता है, वह निश्चित रूप से तुरंत शुद्ध हो जाता है, चाहे वह कितना भी नीच हो। वह भगवान के पास वापस, घर लौटने के योग्य हो जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)