श्री-भगवान उवाच
कुटस त्वा कशमलमिदम्
विषमे समुपस्थितम्
अनार्य-युक्तम अस्वग्यम्
अकीर्ति-करम् अर्जुन
"परम व्यक्ति [भगवान] ने कहा: मेरे प्रिय अर्जुन, ये अशुद्धियाँ तुम पर कैसे आ गई हैं? वे उस व्यक्ति को बिल्कुल भी शोभा नहीं देते जो जीवन के प्रगतिशील मूल्यों को जानता है। वे उच्च ग्रहों की ओर नहीं ले जाते हैं, बल्कि बदनामी की ओर ले जाते हैं।" अर्जुन, क्षत्रिय, सर्वोच्च भगवान द्वारा सीधे आदेश दिए जाने के बावजूद लड़ने से इनकार कर रहा था। इस प्रकार भगवान ने उन्हें एक गैर-आर्य परिवार से संबंधित के रूप में दंडित किया। जो कोई भी भगवान की भक्ति सेवा में उन्नत होता है वह निश्चित रूप से अपने कर्तव्य को जानता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका कर्तव्य हिंसक है या अहिंसक। यदि सर्वोच्च भगवान ने उसे स्वीकृति दी है और उसका आदेश दिया है, तो उसे पूरा किया ही जाना चाहिए। एक आर्य अपना कर्तव्य निभाता है। ऐसा नहीं है कि आर्य अनावश्यक रूप से जीवों के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। आर्य कभी वधशाला नहीं रखते हैं, और वे कभी भी गरीब जानवरों के दुश्मन नहीं होते हैं। प्रचेतास ने कई-कई वर्षों तक, यहाँ तक कि पानी में भी, कठोर तपस्या की। उन्नत सभ्यता में रुचि रखने वालों के लिए तपस्या और दंड स्वीकार करना उनका स्वीकृत व्यवसाय है।
निरांधसाम शब्द का अर्थ है "बिना भोजन"। अनावश्यक रूप से और बेतहाशा खाना एक आर्य का व्यवसाय नहीं है। बल्कि, खाने की प्रक्रिया यथासंभव प्रतिबंधित होनी चाहिए। जब आर्य खाते हैं, तो वे केवल निर्धारित खाद्य पदार्थ खाते हैं। इस संबंध में, भगवान भगवद्गीता (9.26) में कहते हैं:
पत्रम् पुष्पम् फलम् तोयम्
यो मे भक्त्या प्रयच्छति
तद हम भक्त्य-उपहृतम्
अश्नामि प्रयतात्मनः
"यदि कोई मुझे प्रेम और भक्ति के साथ एक पत्ता, एक फूल, फल या पानी चढ़ाता है, तो मैं उसे स्वीकार करूँगा।" इस प्रकार उन्नत आर्यों के लिए प्रतिबंध हैं। यद्यपि भगवान स्वयं कुछ भी खा सकते हैं, लेकिन वह खुद को सब्जियों, फलों, दूध आदि तक सीमित रखते हैं। इस प्रकार यह श्लोक उन लोगों की गतिविधियों का वर्णन करता है जो आर्य होने का दावा करते हैं।
