श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  4.30.38 
वयं तु साक्षाद्भगवन् भवस्य
प्रियस्य सख्यु: क्षणसङ्गमेन ।
सुदुश्चिकित्स्यस्य भवस्य मृत्यो-
र्भिषक्तमं त्वाद्य गतिं गता: स्म ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
हे भगवान, हम भाग्यशाली हैं कि आपके अत्यंत प्रिय और घनिष्ठ मित्र भगवान शिव से कुछ पलों के लिए मिलने का अवसर मिला, जिसके चलते हम आपको प्राप्त कर सके। आप दुनिया के असाध्य रोगों का इलाज कर सकने वाले सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर हैं। हम भाग्यशाली हैं कि हमें आपके चरणों में शरण मिल गई है।
 
O Lord, we are fortunate that we could attain you by the mere association of a moment with your dear and inseparable friend Lord Shiva. You are the best physician capable of treating incurable diseases in this world. It was our good fortune that we could seek shelter at your lotus feet.
तात्पर्य
यह कहा गया है, हरिम विना न मृतिं तरन्ति। भगवान के चरणों की शरण लिए बिना, माया के चंगुल से मुक्ति नहीं मिल सकती, जो कि जन्म, वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु का दोहराव है। प्रचेताओं को भगवान शिव की कृपा से भगवान के चरणों की शरण मिली। भगवान शिव भगवान विष्णु के परम भक्त हैं, जो भगवान के परम व्यक्तित्व हैं। वैष्णवानम यथा शम्भू: सबसे श्रेष्ठ वैष्णव भगवान शिव हैं, और जो वास्तव में भगवान शिव के भक्त हैं, वे भगवान शिव की सलाह का पालन करते हैं और भगवान विष्णु के चरणों की शरण लेते हैं। भगवान शिव के तथाकथित भक्त, जो केवल भौतिक समृद्धि के पीछे हैं, एक तरह से भगवान शिव द्वारा धोखा दिए जाते हैं। वह वास्तव में उन्हें धोखा नहीं देते, क्योंकि भगवान शिव का लोगों को धोखा देने से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन क्योंकि भगवान शिव के तथाकथित भक्त धोखा खाना चाहते हैं, भगवान शिव, जो बहुत आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं, उन्हें सभी प्रकार के भौतिक वरदान देते हैं। विडंबना यह है कि ये वरदान तथाकथित भक्तों के विनाश का कारण बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, रावण ने भगवान शिव से सभी भौतिक वरदान लिए, लेकिन परिणाम यह हुआ कि भगवान शिव के वरदान का दुरुपयोग करने के कारण उसका अंततः अपने परिवार, राज्य और हर चीज के साथ नाश हो गया। अपनी भौतिक शक्ति के कारण, वह बहुत घमंडी और उन्मत्त हो गया, ताकि उसने भगवान रामचंद्र की पत्नी का अपहरण करने का साहस किया। इस तरह वह बर्बाद हो गया। भगवान शिव से भौतिक वरदान प्राप्त करना कठिन नहीं है, लेकिन वास्तव में ये वरदान नहीं हैं। प्रचेताओं को भगवान शिव से वरदान प्राप्त हुआ, और परिणामस्वरूप उन्हें भगवान विष्णु के चरणों की शरण प्राप्त हुई। यही असली वरदान है। गोपियों ने भी वृंदावन में भगवान शिव की पूजा की थी, और भगवान अभी भी वहीं गोपीश्वर के रूप में विराजमान हैं। हालाँकि, गोपियों ने प्रार्थना की कि भगवान शिव उन्हें अपने पति के रूप में भगवान कृष्ण देकर उन्हें आशीर्वाद दें। देवताओं की पूजा करने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते कि किसी का उद्देश्य घर लौटना, वापस भगवत् धाम जाना हो। आमतौर पर लोग भौतिक लाभ के लिए देवताओं के पास जाते हैं, जैसा कि भगवद-गीता (7.20) में बताया गया है:

कामै स्तै स्तै हृता-ज्ञान

प्रपद्यन्तेऽन्य-देवता

तं तं नियमम् आस्थय

प्रकृत्य नियता स्वया

“जिनके मन भौतिक इच्छाओं से विकृत हो जाते हैं, वे देवताओं के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं और अपने स्वभाव के अनुसार पूजा के विशेष नियमों और विनियमों का पालन करते हैं।" भौतिक लाभों से मोहित होने वाले को हृता-ज्ञान कहा जाता है, "जिसने अपनी बुद्धि खो दी है।" इस संबंध में यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कभी-कभी प्रकट शास्त्रों में भगवान शिव को भगवान के परम व्यक्तित्व से भिन्न नहीं बताया गया है। मुद्दा यह है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु इतने घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं कि राय में कोई अंतर नहीं है। वास्तविक तथ्य यह है, एकले ईश्वर कृष्णा, आर सब भृत्य: "केवल एक सर्वोच्च गुरु कृष्ण हैं, और अन्य सभी उनके भक्त या सेवक हैं।" (Cc. आदि 5.142) यही वास्तविक तथ्य है, और इस संबंध में भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच कोई मतभेद नहीं है। प्रकट शास्त्रों में कहीं भी भगवान शिव भगवान विष्णु के समान होने का दावा नहीं करते हैं। यह केवल भगवान शिव के तथाकथित भक्तों का निर्माण है, जो दावा करते हैं कि भगवान शिव और भगवान विष्णु एक हैं। यह वैष्णव-तंत्र में सख्त मना है: यस्तु नारायणं देवम्। भगवान विष्णु, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा स्वामी और सेवक के रूप में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। शिव-विरिंचि-नुतम: भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा द्वारा विष्णु को सम्मानित और प्रणाम किया जाता है। यह विचार करना कि वे सभी समान हैं, एक बड़ा अपराध है। वे सभी इस अर्थ में समान हैं कि भगवान विष्णु भगवान के परम व्यक्तित्व हैं और अन्य सभी उनके शाश्वत सेवक हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)