कामै स्तै स्तै हृता-ज्ञान
प्रपद्यन्तेऽन्य-देवता
तं तं नियमम् आस्थय
प्रकृत्य नियता स्वया
“जिनके मन भौतिक इच्छाओं से विकृत हो जाते हैं, वे देवताओं के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं और अपने स्वभाव के अनुसार पूजा के विशेष नियमों और विनियमों का पालन करते हैं।" भौतिक लाभों से मोहित होने वाले को हृता-ज्ञान कहा जाता है, "जिसने अपनी बुद्धि खो दी है।" इस संबंध में यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कभी-कभी प्रकट शास्त्रों में भगवान शिव को भगवान के परम व्यक्तित्व से भिन्न नहीं बताया गया है। मुद्दा यह है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु इतने घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं कि राय में कोई अंतर नहीं है। वास्तविक तथ्य यह है, एकले ईश्वर कृष्णा, आर सब भृत्य: "केवल एक सर्वोच्च गुरु कृष्ण हैं, और अन्य सभी उनके भक्त या सेवक हैं।" (Cc. आदि 5.142) यही वास्तविक तथ्य है, और इस संबंध में भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच कोई मतभेद नहीं है। प्रकट शास्त्रों में कहीं भी भगवान शिव भगवान विष्णु के समान होने का दावा नहीं करते हैं। यह केवल भगवान शिव के तथाकथित भक्तों का निर्माण है, जो दावा करते हैं कि भगवान शिव और भगवान विष्णु एक हैं। यह वैष्णव-तंत्र में सख्त मना है: यस्तु नारायणं देवम्। भगवान विष्णु, भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा स्वामी और सेवक के रूप में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। शिव-विरिंचि-नुतम: भगवान शिव और भगवान ब्रह्मा द्वारा विष्णु को सम्मानित और प्रणाम किया जाता है। यह विचार करना कि वे सभी समान हैं, एक बड़ा अपराध है। वे सभी इस अर्थ में समान हैं कि भगवान विष्णु भगवान के परम व्यक्तित्व हैं और अन्य सभी उनके शाश्वत सेवक हैं।
