नाहं तिष्ठामि वैकुण्ठे
योिगनाम हृदयेषु वा
तत्र तिष्ठामि नारद
यत्र गायन्ति मद्-भक्ताः
"मेरे प्रिय नारद, वास्तव में मैं अपने निवास, वैकुण्ठ में नहीं रहता, और न ही मैं योगियों के दिलों में रहता हूँ, लेकिन मैं उस स्थान पर रहता हूँ जहाँ मेरे शुद्ध भक्त मेरे पवित्र नाम का नाम जपते हैं और मेरे रूप, लीलाओं और गुणों पर चर्चा करते हैं।" पारलौकिक कंपन के रूप में भगवान की उपस्थिति के कारण, वैकुण्ठ का वातावरण उभारा जाता है। यह वातावरण भय और चिंता से रहित है। एक जीव दूसरे से नहीं डरता। भगवान के पवित्र नाम और महिमा को सुनकर, एक व्यक्ति पवित्र कार्य करता है: श्रृण्वताम स्व-कथाः कृष्णः पुण्य-श्रवण-कीर्तनः (भाग 1.2.17)। इस प्रकार उसकी भौतिक चाहतें तुरंत रुक जाती हैं। कृष्ण चेतना के लिए समाज द्वारा शुरू किया गया यह संकीर्तन आंदोलन वैकुण्ठ बनाने के लिए है, पारलौकिक दुनिया जो कि इस भौतिक दुनिया में भी बिना चिंता के है। विधि दुनिया भर में श्रवणं कीर्तनम प्रक्रिया का प्रसार है। भौतिक जगत में हर कोई अपने साथी मनुष्य से ईर्ष्या करता है। जब तक संकीर्तन-यज्ञ, पवित्र नामों का जप: हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे नहीं किया जाता है, तब तक मानव समाज में पशुता ईर्ष्या मौजूद रहती है। इसलिए प्रचेताओं ने हमेशा भक्तों के समाज में रहने का फैसला किया, और उन्होंने माना कि मानव जीवन में संभव होने वाला यह सर्वोच्च आशीर्वाद है।
