श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.30.34 
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिष: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
स्वर्ग या ब्रह्म के प्रकाश में विलीन होने से भी एक क्षण की शुद्ध भक्त की संगति अधिक फलदायी है। क्योंकि शरीर त्यागकर मरने वाले जीवों के लिए शुद्ध भक्तों की संगति ही सबसे बड़ा वरदान है।
 
There is no comparison between going to heaven or attaining complete salvation and merging with the divine energy (Kaivalya) in front of the company of a pure devotee even for a moment. The best boon for the living beings who die by leaving their bodies is the company of pure devotees.
तात्पर्य
भगवान् चैतन्य के भक्त, महान संत प्रबोधानंद सरस्वती ने कहा है: कैवल्यं नरकायते त्रिदश-पूर आकाश-पुष्पायते। एक शुद्ध भक्त के लिए ब्रह्म के अस्तित्व में विलय होकर कैवल्य को प्राप्त करने की कामना नरक में रहने से भी बदतर है। इसी तरह, वह स्वर्गीय ग्रहों (त्रिदश-पूर) में पदोन्नति को केवल एक और प्रकार का भ्रम मानते हैं। दूसरे शब्दों में, एक शुद्ध भक्त कर्मियों (स्वर्गीय ग्रहों) के गंतव्य या ज्ञानियों (ब्रह्म वैभव में विलय) के गंतव्य में अधिक मूल्य नहीं रखता है। एक शुद्ध भक्त एक स्वर्गीय ग्रह में निवास करने या ब्रह्म वैभव में विलय होने की तुलना में एक और शुद्ध भक्त के साथ कुछ क्षण का संग करने को कहीं अधिक श्रेष्ठ मानता है। इस भौतिक दुनिया में रहने वालों और जन्म और मृत्यु के पुनरावृत्ति (संसार) के अधीन रहने वालों के लिए सबसे बड़ा वरदान शुद्ध भक्तों के साथ संगति करना है। व्यक्ति को ऐसे शुद्ध भक्तों को खोजना चाहिए और उनके साथ रहना चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति पूरी तरह से खुश हो सकता है, भले ही वह भौतिक दुनिया में ही क्यों न रहता हो। कृष्ण भावनाभाव आंदोलन उस उद्देश्य के लिए शुरू किया गया है। जो व्यक्ति भौतिक रूप से अत्यधिक प्रभावित है, वह इस आंदोलन का लाभ उठा सकता है और इससे घनिष्ठ रूप से जुड़ सकता है। इस तरह इस भौतिक दुनिया के भ्रमित और निराश निवासी भक्तों के साथ संगति में सर्वोच्च खुशी पा सकते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)