हे स्वामी, जब तक हम सांसारिक कलंक से दूषित इस नश्वर संसार में रहकर विवश हैं और एक शरीर से दूसरे शरीर में, एक ग्रह से दूसरे ग्रह में भटक रहे हैं, हमारी प्रार्थना है कि हम उन सत्पुरुषों की संगति में पधार सकें जो आपके लीलाओं का चर्चा करते रहते हैं। हम जन्म-जन्म, शरीर-शरीर एवं ग्रह-ग्रह में आपके इस वरदान की प्रार्थना करते रहेंगे।
O Swami, we pray that as long as we remain in this world and move from one body to another and from one planet to another due to our material sins, we may remain in the company of those who are engaged in discussing Your pastimes. We pray for this boon in various bodily forms and in various planets in successive births.
तात्पर्य
यह सर्वश्रेष्ठ आशीर्वाद है जो एक भक्त सर्वोच्च भगवान से मांग सकता है। यह श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा भी पुष्टि की गई है: स्थाने स्थितः श्रुति-गतां तनु-वाङ-मनोभिः (भागवतम् 10.14.3)। भाग्य के अनुसार कोई एक पद पर हो सकता है या दूसरे पर, लेकिन किसी भी स्थिति में, परिस्थितियों की परवाह किए बिना, सर्वोच्च भगवान की गतिविधियों और लीलाओं के बारे में सुनना जारी रखना चाहिए। एक शुद्ध भक्त मुक्ति या जन्म और मृत्यु के चक्र की समाप्ति के लिए प्रार्थना नहीं करता क्योंकि वह इसे महत्वपूर्ण नहीं मानता। एक भक्त के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज भगवान के लीलाओं और महिमाओं के बारे में सुनने का मौका मिलना है। जो भक्त इस संसार में भगवान की सेवा में लगे हुए हैं, उन्हें आध्यात्मिक दुनिया में भी वही अवसर प्राप्त होगा। इस प्रकार एक भक्त के लिए, सब कुछ अध्यात्मिक दुनिया में है, जब तक वह भगवान की लीलाओं के बारे में सुन सकता है, या जहाँ भी वह भगवान का जाप कर सकता है, भगवान व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होते हैं (यत्र गायन्ति मद्-भक्ताः तत्र तिष्ठामि नारद)। जब शुद्ध भक्त भगवान के परम व्यक्तित्व के बारे में जप, श्रवण और चर्चा करने के लिए इकट्ठा होते हैं, तो जहाँ वे इकट्ठा होते हैं वह स्थान वैकुण्ठ बन जाता है। एक भक्त के लिए वैकुण्ठ दुनिया में स्थानांतरण के लिए भगवान से प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक शुद्ध भक्त बिना अपराध के भगवान की महिमा का जप करके कहीं भी वैकुण्ठ या वृंदावन बना सकता है। प्रचेता हर तरह के जीवन रूप में (भव भाव में) भगवान की महिमाओं को सुनने के अवसर के लिए प्रार्थना करते हैं। एक जीवित इकाई एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है। भक्त विशेष रूप से इस प्रक्रिया को रोकने के लिए उत्सुक नहीं है। चैतन्य महाप्रभु प्रार्थना करते हैं, मम जन्मनि जन्मनीश्वर भवताद् भक्तिर अहैतुकी त्वयि: "हे मेरे प्रिय प्रभु, जीवन के बाद जीवन मैं आपकी शुद्ध भक्ति पूर्ण सेवा में स्थिर रहूं।" विनम्रता से, एक भक्त स्वयं को आध्यात्मिक दुनिया में स्थानांतरित होने के लिए अयोग्य मानता है। वह हमेशा खुद को भौतिक प्रकृति के गुणों से दूषित मानता है। न ही एक भक्त को भौतिक प्रकृति के गुणों से मुक्त होने के लिए पूछने की कोई आवश्यकता है। भक्ति भावना स्वयं ही अनुवांशिक स्थिति में है इसलिये इसके लिए विशेष सुविधा मांगने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। निष्कर्ष यह है कि एक शुद्ध भक्त जन्म और मृत्यु की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए चिंतित नहीं है, लेकिन हमेशा अन्य भक्तों के साथ जुड़ने के लिए उत्सुक है जो भगवान की महिमा का जप और श्रवण करने में लगे हुए हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥