सिन्तामण-प्रकर-सद्मासु कल्प-वृक्ष-लक्षावृतेषु सुरभिरभिपालयंतं लक्ष्मी सहस्र-शत-सम्भ्रम-सेव्यमानं गोविन्दम् आदी-पुरुषं तमहं भजामि।
"मैं गोविंद की स्तुति करता हूं, आदियुगी भगवान, जो पहले पूर्वज हैं, जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली गायों का पालन करते हैं, जो आध्यात्मिक रत्नों से निर्मित निवासों में रहते हैं और लाखों कल्पवृक्षों से घिरे हैं। वे हमेशा लाखों लक्ष्मी या गोपियों द्वारा बड़ी श्रद्धा और स्नेह के साथ उनकी सेवा की जाती है।" क्योंकि यह प्रार्थना भगवान ब्रह्मा द्वारा की गई थी, हम उनका अनुसरण करते हुए इस प्रार्थना का पाठ करते हैं। ईश्वर को संतुष्ट करने का यही सबसे आसान तरीका है। शुद्ध भक्त कभी भी सीधे ईश्वर तक पहुंचने का प्रयास नहीं करता है। भगवान की पूजा करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका भक्तों के शिष्य-परंपरा से गुजरना है। इस प्रकार भगवान शिव द्वारा ईश्वर को की गई प्रार्थनाओं को प्रचेता ने दोहराया, जो इस प्रकार ईश्वर को प्रसन्न करने में बहुत सफल रहे।
यहां ईश्वर को पुरंजन के रूप में वर्णित किया गया है। माधवाचार्य के अनुसार, जीव को पुरंजन कहा जाता है क्योंकि वह इस भौतिक संसार का निवासी बन गया है, और भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव में, वह इसके भीतर रहने के लिए मजबूर है। ईश्वर इस भौतिक संसार (पुर) को बनाते हैं और वे इसमें प्रवेश भी करते हैं। अंडांत-स्थ-परमाणु-चयांतर-स्थम: भगवान जीव के हृदय में और परमाणु के भीतर प्रवेश करते हैं। इसलिए जीव और भगवान दोनों को पुरंजन कहा जाता है। एक पुरंजन, जीव, सर्वोच्च पुरंजनों के अधीन है; इसलिए अधीनस्थ पुरंजन का कर्तव्य सर्वोच्च पुरंजन को संतुष्ट करना है। यही भक्ति सेवा है। भगवान रुद्र या भगवान शिव वैष्णव संप्रदाय के मूल आचार्य हैं जिन्हें रुद्र संप्रदाय कहा जाता है। रुद्र-गीतेन इंगित करता है कि भगवान रुद्र के शिष्य-परंपरा के तहत, प्रचेता ने आध्यात्मिक सफलता प्राप्त की।
