श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.30.3 
मैत्रेय उवाच
प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिण: ।
जपयज्ञेन तपसा पुरञ्जनमतोषयन् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
महान ऋषि मैत्रेय ने कहा: राजा प्राचीनबर्हि के पुत्र प्रचेताओं ने अपने पिता की आज्ञाओं का पालन करने के लिए समुद्र के भीतर कठोर तपस्या की। भगवान शिव द्वारा प्रदान किए गए मंत्रों को बार-बार जप कर वे भगवान विष्णु को प्रसन्न करने में सक्षम हुए।
 
Maitreya Rishi said: The Prachetas, sons of King Prachinbarhi, performed severe penance under the sea water to obey their father's command. By repeatedly reciting the mantra given by Lord Shiva, they were able to please Lord Vishnu.
तात्पर्य
मनुष्य सीधे ईश्वर को प्रार्थना कर सकता है पर अगर कोई भगवान शिव या भगवान ब्रह्मा जैसे महान भक्तों द्वारा की गई प्रार्थनाओं को दोहराता है या महान व्यक्तित्वों के पदचिह्नों पर चलता है, तो वह ईश्वर को बहुत आसानी से प्रसन्न कर सकता है। उदाहरण के लिए, हम कभी-कभी ब्रह्म संहिता (5.29) का यह मंत्र जपते हैं:

सिन्तामण-प्रकर-सद्मासु कल्प-वृक्ष-लक्षावृतेषु सुरभिरभिपालयंतं लक्ष्मी सहस्र-शत-सम्भ्रम-सेव्यमानं गोविन्दम्‌ आदी-पुरुषं तमहं भजामि।

"मैं गोविंद की स्तुति करता हूं, आदियुगी भगवान, जो पहले पूर्वज हैं, जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली गायों का पालन करते हैं, जो आध्यात्मिक रत्नों से निर्मित निवासों में रहते हैं और लाखों कल्पवृक्षों से घिरे हैं। वे हमेशा लाखों लक्ष्मी या गोपियों द्वारा बड़ी श्रद्धा और स्नेह के साथ उनकी सेवा की जाती है।" क्योंकि यह प्रार्थना भगवान ब्रह्मा द्वारा की गई थी, हम उनका अनुसरण करते हुए इस प्रार्थना का पाठ करते हैं। ईश्वर को संतुष्ट करने का यही सबसे आसान तरीका है। शुद्ध भक्त कभी भी सीधे ईश्वर तक पहुंचने का प्रयास नहीं करता है। भगवान की पूजा करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका भक्तों के शिष्य-परंपरा से गुजरना है। इस प्रकार भगवान शिव द्वारा ईश्वर को की गई प्रार्थनाओं को प्रचेता ने दोहराया, जो इस प्रकार ईश्वर को प्रसन्न करने में बहुत सफल रहे।

यहां ईश्वर को पुरंजन के रूप में वर्णित किया गया है। माधवाचार्य के अनुसार, जीव को पुरंजन कहा जाता है क्योंकि वह इस भौतिक संसार का निवासी बन गया है, और भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव में, वह इसके भीतर रहने के लिए मजबूर है। ईश्वर इस भौतिक संसार (पुर) को बनाते हैं और वे इसमें प्रवेश भी करते हैं। अंडांत-स्थ-परमाणु-चयांतर-स्थम: भगवान जीव के हृदय में और परमाणु के भीतर प्रवेश करते हैं। इसलिए जीव और भगवान दोनों को पुरंजन कहा जाता है। एक पुरंजन, जीव, सर्वोच्च पुरंजनों के अधीन है; इसलिए अधीनस्थ पुरंजन का कर्तव्य सर्वोच्च पुरंजन को संतुष्ट करना है। यही भक्ति सेवा है। भगवान रुद्र या भगवान शिव वैष्णव संप्रदाय के मूल आचार्य हैं जिन्हें रुद्र संप्रदाय कहा जाता है। रुद्र-गीतेन इंगित करता है कि भगवान रुद्र के शिष्य-परंपरा के तहत, प्रचेता ने आध्यात्मिक सफलता प्राप्त की।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)