जो कुछ भी एक जीव चाहता है, चाहे वह कितना भी महत्वहीन क्यों न हो, प्रभु द्वारा ध्यान दिया जाता है, जो उसे अपनी इच्छाओं को पूरा करने का मौका देते हैं। यदि गैर-भक्तों की इच्छाएं पूरी होती हैं, तो भक्तों की क्यों नहीं होती हैं? एक शुद्ध भक्त केवल भौतिक इच्छाओं के बिना प्रभु की सेवा में संलग्न होना चाहता है, और यदि वह अपने दिल में यह चाहता है, जहां प्रभु स्थित हैं, और यदि वह किसी छिपे हुए उद्देश्य के बिना हैं, तो प्रभु इसे क्यों नहीं समझेंगे? यदि कोई सच्चा भक्त प्रभु या आराध्य-विग्रह, भगवान के स्वरूप की सेवा करता है, तो उसकी सभी गतिविधियाँ सफल साबित होती हैं क्योंकि प्रभु उसके दिल में मौजूद रहते हैं और उसकी ईमानदारी को समझते हैं। इस प्रकार यदि कोई भक्त, पूरे विश्वास के साथ, भक्ति सेवा के निर्धारित कर्तव्यों का निर्वहन करता रहता है, तो वह अंततः सफलता प्राप्त करेगा।
