श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.30.29 
येनोपशान्तिर्भूतानां क्षुल्लकानामपीहताम् ।
अन्तर्हितोऽन्तर्हृदये कस्मान्नो वेद नाशिष: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
जब भगवान अपनी सहज दया से अपने भक्तों के बारे में सोचते हैं, तो केवल उसी प्रक्रिया से नवदीक्षित भक्तों की सारी इच्छाएँ पूरी होती हैं। जीव चाहे कितना भी तुच्छ क्यों न हो, भगवान हर जीव के हृदय में विराजमान हैं। भगवान जीव के बारे में सब कुछ जानते हैं, यहाँ तक कि उसकी सभी इच्छाओं को भी। भले ही हम बहुत तुच्छ हैं, लेकिन भगवान हमारी इच्छाओं को क्यों नहीं जानेंगे?
 
When the Lord thinks of His devotee out of His natural compassion, by that very method all the desires of the newly initiated devotees are fulfilled. The Lord is situated in the heart of every living being, even though the living being is very insignificant. The Lord knows everything about the living being, even all its desires. Even though we are very insignificant living beings, why would the Lord not know our desires?
तात्पर्य
एक अत्यंत उन्नत भक्त खुद को उन्नत नहीं समझता। वह हमेशा बहुत विनम्र होता है। परमेश्वर का परिपूर्ण स्वरूप होने के कारण परमात्मा, या परमात्मा, हर किसी के दिल में विराजमान रहता है और अपने भक्तों की भावनाओं और इच्छाओं को समझ पाता है। भगवद गीता में (मत्तः स्मृतिः ज्ञानमपोहनम् च) के अनुसार, प्रभु गैर-भक्तों को भी उनकी इच्छाओं को पूरा करने के लिए मौका देते हैं।

जो कुछ भी एक जीव चाहता है, चाहे वह कितना भी महत्वहीन क्यों न हो, प्रभु द्वारा ध्यान दिया जाता है, जो उसे अपनी इच्छाओं को पूरा करने का मौका देते हैं। यदि गैर-भक्तों की इच्छाएं पूरी होती हैं, तो भक्तों की क्यों नहीं होती हैं? एक शुद्ध भक्त केवल भौतिक इच्छाओं के बिना प्रभु की सेवा में संलग्न होना चाहता है, और यदि वह अपने दिल में यह चाहता है, जहां प्रभु स्थित हैं, और यदि वह किसी छिपे हुए उद्देश्य के बिना हैं, तो प्रभु इसे क्यों नहीं समझेंगे? यदि कोई सच्चा भक्त प्रभु या आराध्य-विग्रह, भगवान के स्वरूप की सेवा करता है, तो उसकी सभी गतिविधियाँ सफल साबित होती हैं क्योंकि प्रभु उसके दिल में मौजूद रहते हैं और उसकी ईमानदारी को समझते हैं। इस प्रकार यदि कोई भक्त, पूरे विश्वास के साथ, भक्ति सेवा के निर्धारित कर्तव्यों का निर्वहन करता रहता है, तो वह अंततः सफलता प्राप्त करेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)