सर्व-भूत-निवसया यह शब्द स्पष्ट करता है कि भगवान विष्णु हर किसी के हृदय में स्थित हैं और सारी सशर्त आत्माओं के हर कर्म के प्रत्यक्ष साक्षी हैं। इस भौतिक जगत में सशर्त आत्मा की इच्छाएं होती हैं और वह अपनी इच्छाओं के अनुसार कर्म करता है। इन सभी कर्मों को परमेश्वर देखते हैं। भगवद गीता (15.15) में भी इसकी पुष्टि की गई है:
सर्वस्य चाऽहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम पोहनं च
"मैं हर किसी के हृदय में स्थित हूँ और मेरी ओर से ही रोपने, ज्ञान और भूलना आता है।" भगवान हर किसी के हृदय में हैं और वे जीव को बुद्धि देते हैं। जीव की इच्छाओं के अनुसार, भगवान उसे याद करते या भूलते हैं। यदि जीव राक्षसी है और परमेश्वर को भूलना चाहता है तो भगवान उसे बुद्धि देते हैं जिससे वह परमेश्वर को हमेशा के लिए भूल जाता है। इसी प्रकार, जब भक्त परमेश्वर की सेवा करना चाहता है तब भगवान परमात्मा के रूप में भक्त को भक्ति सेवा में उन्नति करने की बुद्धि देते हैं। भगवान सीधे तौर पर कर्मों को देखते हैं और हमारी इच्छाओं को समझते हैं। परमेश्वर हमें जिस तरह से काम करने की इच्छा होती है वह सुविधा देते हैं।
