यस्तु नारायणं देवं
ब्रह्म-रुद्रादि-दैवतैः
समत्वेनैव वीक्षते
स पाषंडी भवेद् ध्रुवम्
जो भगवान विष्णु को भगवान ब्रह्मा या भगवान शिव जैसे देवों के साथ समान श्रेणी में मानता है या जो भगवान ब्रह्मा और शिव को भगवान विष्णु के बराबर समझता है, उसे पाषंडी, विश्वासघाती माना जाता है। इसलिए इस श्लोक में भगवान विष्णु को नमो विशुद्ध-सत्त्वाय शब्दों से विशिष्ट किया गया है। यद्यपि हम जैसे एक जीवित इकाई, भगवान ब्रह्मा अपने धर्मनिष्ठ कार्यों के कारण महान हैं; इसलिए उन्हें ब्रह्मा का उच्च पद दिया गया है। भगवान शिव वास्तव में एक जीवित इकाई की तरह नहीं हैं, लेकिन वह भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व नहीं हैं। उनकी स्थिति भगवान विष्णु, जो कि भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, और ब्रह्मा, जो कि जीवित इकाई हैं, के बीच में है। इसलिए भगवान शिव को ब्रह्म-संहिता (5.45) में इस प्रकार समझाया गया है:
क्षीरं यथा दधि विकार-विशेष-योगात्
संजायते न हि ततः पृथग अस्ति हेतोः
यः शंभुत्वाम पि तथा समुपैति कार्यद
गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि
भगवान शिव को दही (दधि) माना जाता है। दही दूध के अलावा और कुछ नहीं है; फिर भी, दही को दूध के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसी तरह, भगवान शिव भगवान विष्णु की लगभग सभी शक्तियाँ रखते हैं, और वह जीवित इकाई के गुणों से भी ऊपर हैं, लेकिन वह बिल्कुल विष्णु की तरह नहीं हैं, जैसे दही, हालांकि रूपांतरित दूध, दूध जैसा बिल्कुल नहीं है। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को भी वासुदेवाय कृष्णाय के रूप में वर्णित किया गया है। कृष्ण भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के मूल हैं, और सभी विष्णु विस्तार उनके पूर्ण भाग या उनके पूर्ण भाग (जिन्हें स्वाँसा और कला के रूप में जाना जाता है) के भाग हैं। स्वाँसा, या प्रत्यक्ष विस्तार, को अंश भी कहा जाता है। सभी विष्णु-तत्व भगवान कृष्ण के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रत्यक्ष भाग हैं। कृष्ण को वासुदेव के रूप में जाना जाता है क्योंकि वह इस भौतिक दुनिया में वसुदेव के पुत्र के रूप में प्रकट हुए थे। इसी तरह, उन्हें देवकी-नंदन, यशोदा-नंदन, नंद-नंदन और इसी तरह जाना जाता है। बार-बार भगवान अपने भक्तों के प्रभाव को बढ़ाने में बहुत रुचि रखते हैं। इसलिए उन्हें यहाँ प्रभवे सर्व-सात्वतमा के रूप में वर्णित किया गया है। सात्वत समुदाय वैष्णवों का एक समुदाय है, जो भगवान के शुद्ध भक्त होते हैं। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व में असीमित शक्तियाँ हैं, और वह चाहते हैं कि उनके भक्तों को भी असीमित शक्तियों के साथ सौंपा जाए। इसलिए भगवान का भक्त हमेशा अन्य सभी जीवित प्राणियों से अलग होता है। हरि शब्द का अर्थ है "जो सभी दयनीय स्थितियों को दूर करता है," और हरि-मेधस का अर्थ है कि प्रभु हमेशा माया के चंगुल से सशर्त आत्मा को मुक्त करने के तरीके बना रहे हैं। भगवान इतने दयालु हैं कि वह सशर्त आत्माओं को मुक्त करने के लिए व्यक्तिगत रूप से अवतार लेते हैं, और जब भी वह आते हैं, तो वह अपनी योजनाएँ बनाते हैं:
परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम
धर्म-संस्थापनार्थाय
सम्भवामी युगे युगे
"धर्मियों को देने और दुष्टों का नाश करने के लिए, साथ ही धर्म के सिद्धांतों को पुनः स्थापित करने के लिए, मैं स्वयं सहस्राब्दी के बाद सहस्राब्दी प्रकट होता हूं।" (Bg. 4.8)
चूँकि प्रभु सभी आवागमनशील आत्माओं को माया के चंगुल से मुक्त कर देता है, इसलिए उन्हें हरि-मेधा कहा जाता है। अवतारों की सूची में, कृष्ण को ईश्वर के सर्वोच्च और मूल व्यक्तित्व के रूप में वर्णित किया गया है:
एते चाँश-कलाः पुंशः
कृष्णस्तु भगवान स्वयं
इंद्रारी-व्याकुलं लोकं
मृडयन्ति युगे युगे
(भाग. 1.3.28)
ईश्वर के मूल व्यक्तित्व कृष्ण इस भौतिक संसार में तब प्रकट होते हैं जब राक्षसों के द्वारा परेशान किए गए देवता, जो प्रभु के भक्त हैं, उन्हें बुलाते हैं।
