प्रभु को यहाँ पुरुषार्थ-भाज़नम् के रूप में वर्णित किया गया है, जो जीवन के परम लक्ष्य को देने वाले हैं। जीवन में जो भी सफलता हम प्राप्त करना चाहते हैं, वह प्रभु की कृपा से ही प्राप्त हो सकती है। क्योंकि प्रचेता पहले से ही प्रभु की कृपा प्राप्त कर चुके थे, अब वे भौतिक प्रकृति के दोष के अधीन नहीं रह गए थे। जैसे ही सूर्योदय के समय रात का अंधकार तुरंत छंट जाता है, उसी तरह भौतिक प्रकृति के दोष उनसे दूर हो गए। क्योंकि प्रभु उनके समक्ष प्रकट हुए थे, स्वाभाविक ही राजस और तामस भौतिक गुणों का सारा दोष पूरी तरह गायब हो गया था। इसी तरह, जब एक निरपेक्ष भक्त हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करता है, तो वह भी भौतिक दोष से मुक्त हो जाता है क्योंकि प्रभु का नाम और प्रभु एक ही हैं। जैसा कि श्रीमद-भागवतम (1.2.17) में कहा गया है:
शृण्वतां स्वा-कथाः कृष्णः
पुण्य-श्रवण-कीर्तनः
हृद्यंताः-स्थो ह्यभद्राणि
विधुनोति सुहृत्सताम्
"परमात्मा (सबके हृदय में स्थित अतिआत्मा) और सच्चे भक्तों के उपकारी, श्री कृष्ण, भगवान, भक्त के हृदय से भौतिक सुख की कामना को शुद्ध करते हैं, जो उनके संदेशों को सुनने की लालसा विकसित कर चुके हैं, जो कि जब उचित रूप से सुने और जपे जाते हैं तो अपने आप में पुण्य होते हैं।"
प्रभु का पवित्र नाम स्वयं प्रभु है। यदि कोई जप करता है और सुनता है, तो वह शुद्ध हो जाता है। धीरे-धीरे भौतिक दोष दूर हो जाते हैं। प्रचेता उनके समक्ष प्रभु की उपस्थिति के कारण पहले से ही शुद्ध हो चुके थे, इसलिए वे हाथ जोड़कर उचित स्तोत्र प्रस्तुत कर सकते थे। दूसरे शब्दों में, जैसे ही भक्तगण भक्ति सेवा में संलग्न होते हैं, वे तुरंत भगवद्-गीता (सगुणान समतीत्यैतान ब्रह्म-भूयाय कल्पते) में पुष्टि के अनुसार, सभी भौतिक संदूषणों से पर हो जाते हैं। कभी-कभी भक्त भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को व्यक्तिगत रूप से न देख पाने के कारण असंतुष्ट हो जाते हैं। जब प्रचेता ने सर्वोच्च प्रभु को स्वयं उपस्थित देखा, तो उनका दुख दूर हो गया।
