तेषां सतत-युक्तनाम
भजतां प्रीति-पूर्वकम
ददामी बुद्धि-योगं तं
येन मामुपयांति ते
"जो लोग लगातार भक्त हैं और प्रेम से मेरी पूजा करते हैं, मैं उन्हें वह समझ देता हूं जिसके द्वारा वे मेरे पास आ सकते हैं।" (बीजी. 10.10)
जैसा कि कहा गया है (कुशल-कर्मणाम), भक्ति सेवा में शुभ गतिविधियों में लगे लोगों को परमात्मा द्वारा निर्देशित किया जाता है, इस श्लोक में ज्ञ, जो सब कुछ जानता है - अतीत, वर्तमान और भविष्य के रूप में वर्णित है। परमात्मा ईमानदार, निरपेक्ष भक्त को निर्देश देता है कि वह कैसे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के पास पहुँचने में अधिक से अधिक प्रगति कर सकता है। इस संबंध में श्रील जीव गोस्वामी कहते हैं कि परमात्मा, भगवान के व्यक्तित्व का पूर्ण विस्तार, हर किसी के दिल में विराजमान है, लेकिन भक्त के दिल में वह खुद को निरंतर बढ़ते हुए नए रूप में प्रकट करता है। उसके द्वारा प्रेरित होकर, भक्त अपनी भक्ति सेवा के निष्पादन में बढ़ते हुए भौतिक आनंद का अनुभव करता है।
