श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.30.2 
किं बार्हस्पत्येह परत्र वाथ
कैवल्यनाथप्रियपार्श्ववर्तिन: ।
आसाद्य देवं गिरिशं यद‍ृच्छया
प्रापु: परं नूनमथ प्रचेतस: ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
हे बार्हस्पत्य, राजा बर्हिषत् के पुत्र, जिन्हें प्रचेता कहते हैं, उन्होंने भगवान शिव से भेंट करने के बाद क्या प्राप्त किया, जो मोक्षदाता नारायण को अत्यंत प्रिय हैं? वे वैकुण्ठलोक तो गए ही, परन्तु इसके अतिरिक्त उन्होंने इस जीवन में, अथवा अन्य जन्मों में इस संसार में क्या प्राप्त किया?
 
O Barhaspatya, what did the sons of King Barhishat, who are called Pracetas, achieve after meeting Lord Śiva, who is so dear to the Supreme Being, the Bestower of Liberation? They did go to Vaikunthaloka, but apart from that what did they achieve in this life, or in other lives in this world?
तात्पर्य
इस जीवन में या अगले जीवन में, इस ग्रह पर या किसी अन्य ग्रह पर सभी प्रकार की भौतिक खुशियाँ प्राप्त होती हैं। जीवित प्राणी जीवन की इतनी सारी प्रजातियों और इतनी सारी ग्रह प्रणालियों में इस भौतिक ब्रह्मांड के भीतर भटकता रहता है। जीवन काल के दौरान प्राप्त संकट और खुशियों को इहा कहा जाता है, और अगले जीवन में प्राप्त संकट और खुशियों को परत्र कहा जाता है। दरअसल, भगवान महादेव (शिव) इस भौतिक दुनिया के महान देवताओं में से एक हैं। आम तौर पर, आम लोगों पर उनकी कृपा का मतलब भौतिक खुशी है। इस भौतिक दुनिया के प्रधान देव, दुर्गा भगवान महादेव गिरीश के नियंत्रण में हैं। इस प्रकार भगवान महादेव किसी को भी किसी भी प्रकार की भौतिक खुशी प्रदान कर सकते हैं। आम तौर पर लोग भौतिक खुशियाँ प्राप्त करने के लिए भगवान गिरीश के भक्त बनना पसंद करते हैं, लेकिन प्रचेताओं का भगवान महादेव से ईश्वरीय व्यवस्था द्वारा मिलन हुआ। भगवान महादेव ने उन्हें भगवान के परम व्यक्तित्व की पूजा करने का निर्देश दिया और उन्होंने व्यक्तिगत रूप से प्रार्थना की। जैसा कि पिछली कविता में कहा गया है (रुद्र-गीत), विष्णु को भगवान शिव द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनाओं का जाप करने मात्र से, प्रचेता आध्यात्मिक दुनिया में स्थानांतरित हो गए। कभी-कभी भक्त भौतिक सुखों का भी आनंद लेना चाहते हैं इसलिए, भगवान के परम व्यक्तित्व की व्यवस्था से, भक्त को आध्यात्मिक दुनिया में अपने अंतिम प्रवेश से पहले भौतिक दुनिया का आनंद लेने का मौका दिया जाता है। कभी-कभी एक भक्त को एक स्वर्गीय ग्रह में स्थानांतरित किया जाता है - जन लोक, मह लोक, तपोलोक, सिद्ध लोक और इसी तरह। हालाँकि, एक शुद्ध भक्त कभी भी किसी भी प्रकार की भौतिक खुशियों की इच्छा नहीं करता है। शुद्ध भक्त को परिणामस्वरूप सीधे वैकुण्ठ लोक में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जिसे यहाँ परम के रूप में वर्णित किया गया है। इस कविता में विदुर ने बृहस्पति के शिष्य मैत्रेय से प्रचेता की विभिन्न उपलब्धियों के बारे में पूछा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)