मां च योऽव्यभिचारेण
भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान समत्यैतान
ब्रह्म-भूयाय कल्पते
"जो पूर्ण भक्ति-सेवा में संलग्न है, जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता है, वह तत्क्षण भौतिक प्रकृति के गुणों से ऊपर उठ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर पर पहुँच जाता है।"
एक भक्त सदैव ब्रह्म के मंच पर स्थित होता है। भौतिक सुख या दुख से उसका कोई लेना-देना नहीं होता है। जब कोई भक्ति-सेवा में अत्यधिक दृढ़ हो जाता है और भौतिक प्रकृति के गुणों से अप्रभावित होकर समस्त भौतिक लगाव से मुक्त हो जाता है, तो वह परमधाम लौटने के लिए योग्य बन जाता है। हालाँकि विशेष आशीर्वाद से प्रचेता लाखों वर्षों तक भौतिक सुविधाओं का आनंद लेते, वे उनसे आसक्त नहीं होते थे। इस प्रकार अपने भौतिक भोग के अंत में उन्हें आध्यात्मिक जगत में पदोन्नत किया जाता और वे परमधाम लौट जाते थे।
पक्व-गुणाशयाः शब्द का विशेष महत्व है, क्योंकि इसका अर्थ है कि भक्ति-सेवा द्वारा व्यक्ति भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव को त्यागने में सक्षम हो जाता है। जब तक कोई भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित रहता है, वह परमात्मा के पास वापस नहीं लौट सकता है। यह स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है कि भौतिक जगत में सभी ग्रह - ब्रह्मलोक से लेकर नरक ग्रहों तक - एक भक्त के लिए अनुपयुक्त स्थान हैं। पद पदं यद विपदां न तेषां। एक ऐसा स्थान जहाँ प्रत्येक कदम पर खतरा हो, निश्चित रूप से एक सहज स्थान नहीं है। इसलिए भगवान भगवद् गीता (8.16) में कहते हैं:
आ ब्रह्मा-भुवनाल लोकाः
पुनरावर्तिनोऽर्जुन
माम् उपेत्य तु कौन्तेय
पुनर्जन्म न विद्यते
"भौतिक जगत में सबसे ऊंचे ग्रह से लेकर सबसे नीच ग्रह तक, सभी दुख के स्थान हैं जहाँ जन्म और मृत्यु बार-बार होती रहती है। किंतु हे अर्जुन, जो मेरे निवास स्थान को प्राप्त हो जाता है, वह पुनर्जन्म नहीं लेता है।"
इस प्रकार कोई भौतिक ब्रह्मांड के सर्वोच्च ग्रह, ब्रह्मलोक में पदोन्नत हो जाए तो भी कोई लाभ नहीं है। जबकि यदि किसी तरह कोई भगवान के निवास स्थान में पदोन्नत हो जाता है, तो वह कभी भौतिक जगत में नहीं लौटता।
