श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 30: प्रचेताओं के कार्यकलाप  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.30.18 
अथ मय्यनपायिन्या भक्त्या पक्‍वगुणाशया: ।
उपयास्यथ मद्धाम निर्विद्य निरयादत: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात तुम मेरे प्रति निष्कपट भक्ति विकसित करोगे और भौतिक संदूषण से मुक्त हो जाओगे। उस समय, तथाकथित स्वर्गलोक और नरकलोक में भौतिक सुखों से पूरी तरह से अनिच्छुक होकर, तुम अपने घर, भगवान के धाम में लौट आओगे।
 
Thereafter you will develop pure devotion for Me and be freed from all material contamination. At that time, disinterested in material enjoyment in the so-called heavenly and hell-like worlds, you will return to My abode.
तात्पर्य
भगवान के प्रसाद से ही प्रचेताओं को विलक्षण सुविधाएं मिली थीं। हालाँकि वे लाखों वर्षों तक भौतिक सुविधाओं का उपभोग करने के लिए जीवित रह सकते थे, फिर भी वे प्रभु की दिव्य प्रेममयी सेवा से विचलित नहीं होते थे। इस प्रकार पूर्णत: तल्लीन होने से प्रचेता समस्त सांसारिक मोहों से पूर्णत: मुक्त हो गए। भौतिक लगाव बहुत प्रबल होता है। एक जन्मकाल में, एक भौतिकवादी भूमि, धन, मित्र, समाज, मिलनसारिता, प्रेम आदि को प्राप्त करने में संलग्न रहता है। वह शरीर के विनाश के पश्चात् स्वर्गलोक का सुख भोगना चाहता है। तथापि यदि कोई भक्ति-सेवा में संलग्न है, तो वह समस्त प्रकार के सांसारिक सुख-दुख से अनासक्त हो जाता है। भौतिक जगत में, जो लोग उच्च ग्रहों में ऊपर उठते हैं, उनकी मान्यता होती है कि वे समस्त भौतिक सुविधाओं का आनंद लेंगे, जबकि जो निम्न ग्रहों में रहते हैं, वे नरक जैसी स्थिति में जीवन बिताते हैं। जबकि एक भक्त स्वर्ग और नर्क दोनों ही परिस्थितियों से परे हैं। भगवद् गीता (14.26) में, एक भक्त की स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

मां च योऽव्यभिचारेण

भक्ति-योगेन सेवते

स गुणान समत्यैतान

ब्रह्म-भूयाय कल्पते

"जो पूर्ण भक्ति-सेवा में संलग्न है, जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता है, वह तत्क्षण भौतिक प्रकृति के गुणों से ऊपर उठ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर पर पहुँच जाता है।"

एक भक्त सदैव ब्रह्म के मंच पर स्थित होता है। भौतिक सुख या दुख से उसका कोई लेना-देना नहीं होता है। जब कोई भक्ति-सेवा में अत्यधिक दृढ़ हो जाता है और भौतिक प्रकृति के गुणों से अप्रभावित होकर समस्त भौतिक लगाव से मुक्त हो जाता है, तो वह परमधाम लौटने के लिए योग्य बन जाता है। हालाँकि विशेष आशीर्वाद से प्रचेता लाखों वर्षों तक भौतिक सुविधाओं का आनंद लेते, वे उनसे आसक्त नहीं होते थे। इस प्रकार अपने भौतिक भोग के अंत में उन्हें आध्यात्मिक जगत में पदोन्नत किया जाता और वे परमधाम लौट जाते थे।

पक्व-गुणाशयाः शब्द का विशेष महत्व है, क्योंकि इसका अर्थ है कि भक्ति-सेवा द्वारा व्यक्ति भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव को त्यागने में सक्षम हो जाता है। जब तक कोई भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित रहता है, वह परमात्मा के पास वापस नहीं लौट सकता है। यह स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया है कि भौतिक जगत में सभी ग्रह - ब्रह्मलोक से लेकर नरक ग्रहों तक - एक भक्त के लिए अनुपयुक्त स्थान हैं। पद पदं यद विपदां न तेषां। एक ऐसा स्थान जहाँ प्रत्येक कदम पर खतरा हो, निश्चित रूप से एक सहज स्थान नहीं है। इसलिए भगवान भगवद् गीता (8.16) में कहते हैं:

आ ब्रह्मा-भुवनाल लोकाः

पुनरावर्तिनोऽर्जुन

माम् उपेत्य तु कौन्तेय

पुनर्जन्म न विद्यते

"भौतिक जगत में सबसे ऊंचे ग्रह से लेकर सबसे नीच ग्रह तक, सभी दुख के स्थान हैं जहाँ जन्म और मृत्यु बार-बार होती रहती है। किंतु हे अर्जुन, जो मेरे निवास स्थान को प्राप्त हो जाता है, वह पुनर्जन्म नहीं लेता है।"

इस प्रकार कोई भौतिक ब्रह्मांड के सर्वोच्च ग्रह, ब्रह्मलोक में पदोन्नत हो जाए तो भी कोई लाभ नहीं है। जबकि यदि किसी तरह कोई भगवान के निवास स्थान में पदोन्नत हो जाता है, तो वह कभी भौतिक जगत में नहीं लौटता।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)