तेषां सतत-युक्तानाम्
भजताँ प्रीति-पूर्वकम
ददामि बुद्धि-योगं तं
येन मामुपयान्ति ते
"जो लगातार भक्ति करते हैं, और प्रेमपूर्वक मेरी आराधना करते हैं, उन्हें मैं वह ज्ञान देता हूँ जिसके द्वारा वे मुझ तक पहुँच सकते हैं।"
जो प्रभु से विविध इच्छाओं की पूर्ति हेतु प्रार्थना करता है, उसे यह जानना चाहिए कि इच्छा की सर्वाधिक श्रेष्ठ सिद्धि ईश्वर के घर, भगवान के पास वापस जाना है। इस श्लोक में संकेत किया गया है कि जो लोग राजा प्राचीनबर्हिशत के पुत्र, प्रचेता के कृत्यों का स्मरण करते हैं, उन्हें छुटकारा मिलता है और वे धन्य हो जाते हैं। तो राजा प्राचीनबर्हिशत के पुत्रों की तो बात ही क्या, जो सीधे भगवान से जुड़े हैं? यही तो परंपरा पद्धति का तरीका है। यदि हम आचार्यों का अनुसरण करते हैं, तो हमें भी अपने पूर्ववर्ती जितना ही लाभ मिलता है। यदि कोई अर्जुन के निर्णयों का अनुसरण करता है, तो उसे भगवान से सीधे भगवद-गीता सुनने वाला माना जाना चाहिए। भगवान से सीधे भगवद-गीता सुनने और अर्जुन जैसे व्यक्तित्व का अनुसरण करने, जिन्होंने भगवान से सीधे भगवद-गीता सुनी, में कोई अंतर नहीं है। कभी-कभी मुर्ख व्यक्ति यह तर्क देते हैं कि क्योंकि कृष्ण इस समय मौजूद नहीं हैं, इसलिए कोई उनसे सीधे निर्देश नहीं ले सकता। ऐसे मूर्ख व्यक्ति यह नहीं जानते हैं कि भगवान द्वारा बोली हुई भगवद-गीता को ज्यों कि त्यों स्वीकार करने पर, भगवद-गीता को सीधे सुनने और इसे पढ़ने में कोई अंतर नहीं है। हालाँकि, यदि कोई अपने अपूर्ण व्याख्यानों से भगवद-गीता को समझना चाहता है, तो वह भगवद-गीता के रहस्यों को कभी नहीं समझ सकता है, भले ही वह सांसारिक अनुमान के अनुसार एक महान विद्वान क्यों न हो।
