तस्मिन्भगिन्यो मम भर्तृभि: स्वकै-
र्ध्रुवं गमिष्यन्ति सुहृद्दिदृक्षव: ।
अहं च तस्मिन्भवताभिकामये
सहोपनीतं परिबर्हमर्हितुम् ॥ ९ ॥
अनुवाद
मुझे लगता है कि सभी बहनें अपने संबंधियों से मिलने की इच्छा से इस महायज्ञ में ज़रूर पधारी होंगी, अपने-अपने पतियों के साथ। मैं भी अपने पिताजी द्वारा दिए गए गहने पहनकर आपके साथ उस उत्सव में पधारना चाहती हूँ।
I think that all my sisters must have come to this great sacrifice with their husbands, with the desire to meet their relatives. I too am desirous of adorning myself with the ornaments given to me by my father and participating in that festival with you.
तात्पर्य
एक औरत का स्वभाव होता है कि वह अपने आप को गहनों से और सुंदर कपड़ों से सजाना और अपने पति के साथ सामाजिक समारोहों में शामिल होना, दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना और इस तरह जीवन का आनंद लेना। यह प्रवृति असामान्य नहीं है, क्योंकि महिला भौतिक आनंद का मूलभूत सिद्धांत है। इसलिए संस्कृत में स्त्री शब्द का अर्थ होता है "वह जो भौतिक आनंद के क्षेत्र का विस्तार करती है।" भौतिक दुनिया में स्त्री और पुरूष के बीच आकर्षण होता है। यह सशर्त जीवन की व्यवस्था है। एक औरत पुरूष को अपनी ओर आकर्षित करती है, और इस तरह घर, धन, बच्चे और दोस्ती से जुड़ी भौतिक क्रियाओं का दायरा बढ़ जाता है, और इस प्रकार अपनी भौतिक मांगों को कम करने के बजाय, भौतिक आनंद में उलझ जाता है। यद्यपि, भगवान शिव अलग हैं; इसलिए उनका नाम शिव है। वे भौतिक आनंद से बिल्कुल भी आकर्षित नहीं हैं, हालांकि उनकी पत्नी, सती, एक बहुत महान नेता की बेटी थीं और उन्हें ब्रह्मा के अनुरोध पर उन्हें दिया गया था। भगवान शिव अनिच्छुक थे, लेकिन एक राजा की बेटी सती, एक महिला के रूप में, आनंद चाहती थीं। वह अपने पिता के घर जाना चाहती थीं, जैसे अन्य बहनें कर सकती हैं, उनसे मिलना और सामाजिक जीवन का आनंद लेना चाहती थीं। यहाँ, उन्होंने विशेष रूप से संकेत दिया कि वह अपने पिता द्वारा दिए गए गहनों से खुद को सजाएंगी। उसने यह नहीं कहा कि वह अपने पति द्वारा दिए गए गहनों से खुद को सजाएगी क्योंकि उसके पति ऐसे सभी मामलों के बारे में लापरवाह थे। वे नहीं जानते थे कि अपनी पत्नी को कैसे सजाना है और सामाजिक जीवन में कैसे भाग लेना है क्योंकि वह हमेशा भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के विचारों में तल्लीन रहते थे। वैदिक प्रणाली के अनुसार, विवाह के समय एक बेटी को पर्याप्त दहेज दिया जाता है, और इसलिए सती को भी उनके पिता द्वारा दहेज दिया गया था, और उसमें आभूषण भी शामिल थे। यह भी प्रथा है कि पति कुछ आभूषण देते हैं, लेकिन यहाँ विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि उसके पति, भौतिक रूप से लगभग कुछ भी नहीं होने के कारण, ऐसा नहीं कर सके; इसलिए वह अपने पिता द्वारा दिए गए गहनों से खुद को सजाना चाहती थीं। सती के लिए यह सौभाग्य की बात थी कि भगवान शिव ने अपनी पत्नी से गहने नहीं लिए और उन्हें गांजे के लिए खर्च नहीं किया, क्योंकि जो लोग गांजा पीने में भगवान शिव की नकल करते हैं, वे घर के मामलों से लेकर हर चीज का फायदा उठाते हैं; वे अपनी पत्नियों की सारी संपत्ति ले लेते हैं और धूम्रपान, नशा और अन्य इसी तरह की गतिविधियों पर खर्च कर देते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥