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श्लोक 4.3.9  |
तस्मिन्भगिन्यो मम भर्तृभि: स्वकै-
र्ध्रुवं गमिष्यन्ति सुहृद्दिदृक्षव: ।
अहं च तस्मिन्भवताभिकामये
सहोपनीतं परिबर्हमर्हितुम् ॥ ९ ॥ |
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| अनुवाद |
| मुझे लगता है कि सभी बहनें अपने संबंधियों से मिलने की इच्छा से इस महायज्ञ में ज़रूर पधारी होंगी, अपने-अपने पतियों के साथ। मैं भी अपने पिताजी द्वारा दिए गए गहने पहनकर आपके साथ उस उत्सव में पधारना चाहती हूँ। |
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| मुझे लगता है कि सभी बहनें अपने संबंधियों से मिलने की इच्छा से इस महायज्ञ में ज़रूर पधारी होंगी, अपने-अपने पतियों के साथ। मैं भी अपने पिताजी द्वारा दिए गए गहने पहनकर आपके साथ उस उत्सव में पधारना चाहती हूँ। |
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