माम च योऽव्यभिचारेण
भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान समतीत्यैतान
ब्रह्म-भूयाय कल्पते
इसलिए शुद्ध-सत्व, जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है, पारलौकिक स्थिति है, जिसे तकनीकी रूप से वासुदेव कहा जाता है। वासुदेव उस व्यक्ति का भी नाम है जिससे कृष्ण प्रकट होते हैं। यह श्लोक बताता है कि शुद्ध अवस्था को इसलिए वासुदेव कहा जाता है क्योंकि उस अवस्था में वासुदेव, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व किसी भी आवरण के बिना प्रकट होता है। इसलिए, अविवाहित भक्ति सेवा करने के लिए, भौतिक लाभ प्राप्त करने की इच्छा के बिना भक्ति सेवा के नियमों और विनियमों का पालन करना चाहिए या मानसिक अटकलें लगानी चाहिए।
शुद्ध भक्ति सेवा में व्यक्ति केवल कर्तव्य के रूप में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की सेवा करता है, बिना किसी कारण के और भौतिक स्थितियों द्वारा बाधित हुए बिना। इसे शुद्ध-सत्व या वासुदेव कहा जाता है, क्योंकि उस अवस्था में सर्वोच्च व्यक्ति, कृष्ण, भक्त के हृदय में प्रकट होते हैं। श्रील जीवा गोस्वामी ने अपने भगवत-संदर्भ में इस वासुदेव या शुद्ध-सत्त्व का बहुत अच्छी तरह से वर्णन किया है। वह बताते हैं कि अष्टोत्तर-शता (108) को गुरु के नाम में जोड़ा जाता है ताकि उस व्यक्ति को इंगित किया जा सके जो शुद्ध-सत्त्व में या वासुदेव की पारलौकिक स्थिति में स्थित है। वासुदेव शब्द का उपयोग अन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है। उदाहरण के लिए, वासुदेव का अर्थ वह भी होता है जो हर जगह या सर्व-व्यापी होता है। सूर्य को भी वासुदेव-शब्दितम कहा जाता है। वासुदेव शब्द का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, लेकिन हम जो भी उद्देश्य अपनाते हैं, वासुदेव का अर्थ भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व का सर्व-व्यापी या स्थानीयकृत है। भगवद-गीता (7.19) में भी कहा गया है, वासुदेवः सर्वम इति। तथ्यात्मक बोध वासुदेव, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझना और उनके प्रति समर्पण करना है। वासुदेव वह भूमि है जिसमें वासुदेव, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व प्रकट होता है। जब व्यक्ति भौतिक प्रकृति के संदूषण से मुक्त हो जाता है और शुद्ध कृष्ण चेतना में या वासुदेव अवस्था में स्थित होता है, तो वासुदेव, सर्वोच्च व्यक्ति प्रकट होता है। इस अवस्था को कैवल्य भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है "शुद्ध चेतना"। ज्ञानं सात्त्विकं कैवल्यम्: जब व्यक्ति शुद्ध, पारलौकिक ज्ञान में स्थित होता है, तो वह कैवल्य में स्थित होता है। इसलिए वासुदेव का अर्थ कैवल्य भी है, जो शब्द आमतौर पर निराकारवादियों द्वारा उपयोग किया जाता है। अवैयक्तिक कैवल्य साक्षात्कार का अंतिम चरण नहीं है। कृष्ण चेतना कैवल्य में, जब कोई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझता है, तो वह सफल होता है। उस शुद्ध अवस्था में, श्रवण, जप, स्मरण आदि द्वारा, कृष्ण के विज्ञान के ज्ञान के विकास के कारण, व्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझ सकता है। ये सभी गतिविधियाँ सर्वोच्च भगवान की आंतरिक ऊर्जा के मार्गदर्शन में होती हैं।
आंतरिक शक्ति की क्रिया का वर्णन भी इस श्लोक में अपावृतः के रूप में किया गया है, किसी भी आवरण से मुक्त। क्योंकि भगवान, उनका नाम, उनका रूप, उनका गुण, उनकी साज-सज्जा आदि, पारलौकिक होने के कारण, भौतिक प्रकृति से परे हैं, भौतिकवादी इंद्रियों से उनमें से किसी एक को समझना संभव नहीं है। जब इंद्रियों को शुद्ध भक्ति सेवा के निर्वहन द्वारा शुद्ध किया जाता है (हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते), शुद्ध इंद्रियां कृष्ण को बिना ढके देख सकती हैं। अब कोई यह पूछ सकता है कि चूंकि तथ्यतः भक्त का भौतिक अस्तित्व वाला शरीर ही होता है, तो यह कैसे संभव है कि भक्ति सेवा से वही भौतिकवादी आंखें शुद्ध हो जाती हैं? जैसा कि भगवान चैतन्य ने कहा है, भक्ति सेवा मन के दर्पण को साफ करती है। एक साफ दर्पण में कोई अपने चेहरे को बहुत स्पष्ट रूप से देख सकता है। इसी तरह, केवल मन के दर्पण को साफ करके ही कोई भगवान के व्यक्तित्व के बारे में स्पष्ट धारणा बना सकता है। भगवद-गीता (8.8) में कहा गया है, अभ्यास-योग-युक्तेन। भक्ति सेवा में अपने निर्धारित कर्तव्यों को निष्पादित करके, चेतसा नान्य-गामिना, या केवल भगवान के बारे में सुनकर और उनका नाम जप करके, यदि किसी का मन हमेशा जप और श्रवण में लगा रहता है और उसे कहीं और जाने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो कोई भगवान का एहसास कर सकता है। जैसा कि भगवान चैतन्य ने पुष्टि की है, भक्ति-योग प्रक्रिया से, श्रवण और जप से शुरू होकर, कोई हृदय और मन को शुद्ध कर सकता है, और इस तरह कोई स्पष्ट रूप से भगवान के व्यक्तित्व को देख सकता है।
भगवान शिव ने कहा कि चूँकि उनका हृदय हमेशा वासुदेव, परम व्यक्तित्व भगवान् का मनन करने से भर जाता था, परम प्रभु की उनकी मन और हृदय में उपस्थिति के कारण, वे हमेशा उस परम भगवान को प्रणाम अर्पित करते थे। दूसरे शब्दों में, भगवान शिव हमेशा तल्लीनता, समाधि, में रहते हैं। यह समाधि भक्त के नियंत्रण में नहीं है; यह वासुदेव के नियंत्रण में है, क्योंकि परम व्यक्तित्व भगवान की पूरी आंतरिक ऊर्जा उनकी आज्ञा के अधीन कार्य करती है। बेशक, भौतिक ऊर्जा भी उनकी आज्ञा से कार्य करती है, पर उनकी प्रत्यक्ष इच्छा विशेष रूप से आध्यात्मिक ऊर्जा के माध्यम से ही पूरी होती है। इस तरह उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा के द्वारा वे स्वयं को प्रकट करते हैं। भगवद् गीता में (4.6) कहा गया है, सम्भावम्य ात्म मायया। ात्म मायया का अर्थ है “आंतरिक सामर्थ्य।” अपनी मधुर इच्छा से वे भक्त की दिव्य प्रेममयी सेवा से संतुष्ट होकर अपनी आंतरिक शक्ति से स्वयं को प्रकट करते हैं। भक्त कभी यह आज्ञा नहीं देता, “हे मेरे प्रभु, कृपया यहाँ पधारें ताकि मैं आपको देख सकूं।” भक्त का यह पद नहीं है कि वह परम व्यक्तित्व भगवान को उनके सामने आने या उनके सामने नृत्य करने की आज्ञा दे। ऐसे कई कथित भक्त हैं जो प्रभु को उनके सामने नृत्य करते हुए आने की आज्ञा देते हैं। हालाँकि, प्रभु किसी की भी आज्ञा के अधीन नहीं हैं, पर यदि आपकी शुद्ध भक्ति भावनाओं से वे संतुष्ट होते हैं, तो वे स्वयं को प्रकट करते हैं। इसलिए इस श्लोक का एक सार्थक शब्द अधोक्षज है, क्योंकि यह इस बात की ओर संकेत करता है कि हमारी भौतिक इंद्रियों की गतिविधियाँ परम व्यक्तित्व भगवान को समझने में विफल रहेंगी। कोई भी केवल अपने अनुमानित मन के प्रयास से परम व्यक्तित्व भगवान को नहीं समझ सकता है, पर अगर वह चाहता है तो वह अपनी इंद्रियों की सभी भौतिक गतिविधियों को वश में कर सकता है, और प्रभु अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को प्रकट करके शुद्ध भक्त को स्वयं को प्रकट कर सकते हैं। जब परम व्यक्तित्व भगवान शुद्ध भक्त को स्वयं को प्रकट करते हैं, तो भक्त का कोई और कर्तव्य नहीं शेष रह जाता सिवाय उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम अर्पित करने के। परम सत्य अपने रूप में भक्त के सामने स्वयं को प्रकट करता है। वे निराकार नहीं हैं। वासुदेव निराकार नहीं हैं, क्योंकि इस श्लोक में बताया गया है जैसे ही प्रभु स्वयं को प्रकट करते हैं, भक्त उन्हें प्रणाम अर्पित करता है। प्रणाम किसी व्यक्ति को अर्पित किये जाते हैं, किसी अवैयक्तिक को नहीं। किसी को मायावादी व्याख्या को नहीं स्वीकारना चाहिए कि वासुदेव अवैयक्तिक हैं। जैसा कि भगवद् गीता में कहा गया है, प्रपद्यते: कोई आत्मसमर्पण करता है। कोई किसी व्यक्ति के प्रति आत्मसमर्पण करता है, अवैयक्तिक अद्वैत के प्रति नहीं। जब भी समर्पण करने या प्रणाम करने का प्रश्न होता है, समर्पण या प्रणाम का एक लक्ष्य होना चाहिए।
