प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं
विधीयते साधु मिथ: सुमध्यमे ।
प्राज्ञै: परस्मै पुरुषाय चेतसा
गुहाशयायैव न देहमानिने ॥ २२ ॥
अनुवाद
हे प्यारी युवा पत्नी, निश्चित रूप से, मित्र और रिश्तेदार खड़े होकर एक-दूसरे का स्वागत करते हैं और अभिवादन करते हैं। लेकिन जो लोग आध्यात्मिक रूप से ऊँचे स्तर पर पहुँच चुके हैं, वे बुद्धिमान होने के कारण ऐसे सम्मान को शरीर के अंदर बैठे परमात्मा को देते हैं, न कि उस व्यक्ति को जो शरीर से जुड़ा हुआ है।
O young wife, undoubtedly, friends and relatives stand up and greet each other by welcoming and saluting each other. But those who have risen to the divine position, being enlightened, pay such respects only to the Supreme Soul residing in every body, and not to the body conscious man.
तात्पर्य
यह तर्क दिया जा सकता है कि चूंकि दक्ष भगवान शिव के ससुर थे, इसलिए भगवान शिव का कर्तव्य था कि उन्हें सम्मान दें। उस तर्क के जवाब में यहाँ यह समझाया गया है कि जब कोई विद्वान व्यक्ति खड़ा हो जाता है या स्वागत में प्रणाम करता है, तो वह परमात्मा को सम्मान देता है, जो हर किसी के हृदय में विराजमान है। इसलिए वैष्णवों में यह देखा जाता है कि जब कोई शिष्य अपने आध्यात्मिक गुरु को प्रणाम करता है, तो आध्यात्मिक गुरु तुरंत प्रणाम लौटाते हैं क्योंकि वे परस्पर शरीर को नहीं बल्कि परमात्मा को प्रणाम करते हैं। इसलिए आध्यात्मिक गुरु भी शिष्य के शरीर में स्थित परमात्मा को सम्मान देते हैं। भगवान श्रीमद् भागवतम में कहते हैं कि उनके भक्त को सम्मान देना, उन्हें सम्मान देने से अधिक मूल्यवान है। भक्त शरीर से तादात्म्य नहीं रखते, इसलिए वैष्णव को सम्मान देने का अर्थ है विष्णु को सम्मान देना। यह भी कहा गया है कि शिष्टाचार के तौर पर, जैसे ही कोई वैष्णव को देखता है, उसे तुरंत उसे सम्मान देना चाहिए, जो भीतर बैठे परमात्मा को इंगित करता है। एक वैष्णव शरीर को विष्णु के मंदिर के रूप में देखता है। चूंकि भगवान शिव पहले ही कृष्ण-भावना में परमात्मा को सम्मान दे चुके थे, इसलिए दक्ष को सम्मान देना, जो अपने शरीर से तादात्म्य करते थे, पहले ही किया जा चुका था। उनके शरीर को सम्मान देने की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि यह किसी वैदिक आज्ञा द्वारा निर्देशित नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥