| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 3: श्रीशिव तथा सती का संवाद » श्लोक 17 |
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| | | | श्लोक 4.3.17  | विद्यातपोवित्तवपुर्वय:कुलै:
सतां गुणै: षड्भिरसत्तमेतरै: ।
स्मृतौ हतायां भृतमानदुर्दृश:
स्तब्धा न पश्यन्ति हि धाम भूयसाम् ॥ १७ ॥ | | | | | | अनुवाद | | यद्यपि शिक्षा, तप, धन, सौंदर्य, यौवन और कुल ये छह गुण बहुत ऊँचे होते हैं, पर जो इनको प्राप्त करके मद में चूर हो जाता है, उसका सद्ज्ञान नष्ट हो जाता है और वह महापुरुषों के गुणों का सम्मान नहीं कर पाता। | | | | यद्यपि शिक्षा, तप, धन, सौंदर्य, यौवन और कुल ये छह गुण बहुत ऊँचे होते हैं, पर जो इनको प्राप्त करके मद में चूर हो जाता है, उसका सद्ज्ञान नष्ट हो जाता है और वह महापुरुषों के गुणों का सम्मान नहीं कर पाता। | | ✨ ai-generated | | |
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