श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 3: श्रीशिव तथा सती का संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.3.11 
त्वय्येतदाश्चर्यमजात्ममायया
विनिर्मितं भाति गुणत्रयात्मकम् ।
तथाप्यहं योषिदतत्त्वविच्च ते
दीना दिद‍ृक्षे भव मे भवक्षितिम् ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
यह दृश्य संसार तीनों गुणों की आपस में परस्पर प्रभाव-प्रक्रिया अथवा ईश्वर की बाहरी शक्ति की अद्भुत सृष्टि है। यह सच्चाई आप पूरी तरह जानते हैं। परंतु मैं एक साधारण स्त्री हूँ, और जैसा कि आप जानते हैं, मैं सत्य के बारे में कुछ खास नहीं जानती हूँ। इसलिए मैं अपने जन्मस्थान को एक बार फिर से देखना चाहती हूँ।
 
This visible world is the wonderful creation of the interaction of the three gunas or the external energy of the Supreme Lord. You are well aware of this reality. But I am a helpless woman and as you know I am ignorant of the truth. Therefore I want to see my birthplace once again.
तात्पर्य
साती को पूरी जानकारी थी कि उसके पति, भगवान शिव को सांसारिक भौतिकता में कोई रुचि नहीं है। जो प्रकृति के तीनों गुणों के मिलने से पैदा होती है। इसीलिए उसने अपने पति को 'अज' कहा था, जिसका मतलब है ऐसा व्यक्ति जो जन्म और मृत्यु के बंधन से ऊपर उठ चुका है, या जिसने अपनी अनादि स्थिति को स्वीकार कर लिया है। उसने कहा "भ्रम और उलटी परछाई को, भौतिकता या ब्रह्मांड को सच मानना आपके लिए संभव नहीं है, क्योंकि आप आत्मनिष्ठ हैं। आपके लिए सामाजिक जीवन का आकर्षण और ये विचार कि कोई पिता है, कोई माता है, और कोई बहन है। ये सब व्यर्थ के रिश्ते हैं, यह सब पहले ही खत्म हो चुका है; लेकिन चूँकि मैं एक गरीब औरत हूँ, इसलिए मैं आत्मज्ञान के मामले में उन्नत नहीं हूँ। इसलिए स्वाभाविक रूप से ये मुझे सच्चे लगते हैं।" सिर्फ कम बुद्धिमान लोग ही आध्यात्मिक दुनिया के भ्रामक प्रतिबिंब को सच मानते हैं। जो बाहरी शक्ति के प्रभाव में हैं, वो इस सांसारिक दुनिया को सच मानते हैं, जबकि जो आध्यात्मिक ज्ञान को पा चुके हैं वे जानते हैं कि ये सब भ्रम है। असली सच्चाई दूसरी जगह है, आध्यात्मिक दुनिया में। सत्या ने कहा, "लेकिन जहाँ तक मेरी बात है, मुझे आत्मज्ञान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। मैं गरीब हूँ क्योंकि मैं सच नहीं जानती। मैं अपने जन्मस्थान से आकर्षित हूँ, और मैं उसे देखना चाहती हूँ।" जिस व्यक्ति का अपने जन्मस्थान से, अपने शरीर से, और इस तरह की अन्य चीज़ों से मोह हो, जिसका ज़िक्र भागवत में किया गया है, वो गधा या गाय के समान होता है। हो सकता है साती ने अपने पति भगवान शिव से ये सब बहुत बार सुना हो, लेकिन चूँकि वो स्त्री थी, 'योषित', इसलिए उसका मोह सांसारिक चीज़ों से कभी खत्म नहीं हुआ। 'योषित' का मतलब है "वह जिसका आनंद लिया जाये।" इसलिए स्त्री को योषित कहा जाता है। आध्यात्मिक उन्नति में योषितों के साथ संगति को हमेशा रोका जाता है क्योंकि अगर कोई योषित के हाथों की कठपुतली जैसा है, तो उसकी आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती है। ऐसा कहा जाता है, "जो एक स्त्री (योषित-क्रीड़ा-मृगेषु) के हाथों की कठपुतली की तरह हैं, वो कभी आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकते।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)