श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  4.29.85 
अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम् ।
एवं स्त्रियाश्रम: पुंसश्छिन्नोऽमुत्र च संशय: ॥ ८५ ॥
 
 
अनुवाद
मैंने अपने गुरु से राजा पुरंजना के रूपक को सुना था जोकि यहाँ अधिकारपूर्वक वर्णित है। यह अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण है। जो व्यक्ति इस रूपक के उद्देश्य को समझ लेता है वह निश्चित रूप से शरीर से संबंधित धारणाओं से मुक्त हो जाएगा और मृत्यु के बाद के जीवन को स्पष्ट रूप से समझ जाएगा। हालाँकि, जो व्यक्ति आत्मा के देहान्तरण को ठीक से नहीं समझ पाता है, वह भी इस विवरण का अध्ययन करके इसे अच्छी तरह से समझ सकता है।
 
I heard the allegory of King Purañjana, which is narrated here with authority, from my Guru. It is full of spiritual knowledge. If one understands the purpose of this allegory, he will certainly get rid of the body-life consciousness and will be able to understand life after death properly. If one does not understand the transmigration of the soul properly, he can understand it well by reading this story.
तात्पर्य
"स्त्रिया" शब्द का अर्थ है, "पत्नी के साथ"। यह एक महत्वपूर्ण शब्द है। पुरुष और स्त्री का एक साथ होना ही भौतिक अस्तित्व का मर्म है। इस भौतिक संसार में स्त्री और पुरुष के बीच का आकर्षण बहुत प्रबल है। जीवन की सभी प्रजातियों में ही स्त्री और पुरुष के बीच का आकर्षण जीवन का मूल आधार है। मानव समाज में भी इसी तरह का सामंजस्य दिखता है, लेकिन यहाँ इसे नियंत्रित किया गया है। भौतिक अस्तित्व का अर्थ है स्त्री और पुरुष के रूप में एक साथ रहना और परस्पर आकर्षित होना। हालाँकि, जब व्यक्ति पूरी तरह से आध्यात्मिक जीवन को समझ लेता है, तो विपरीत लिंग के लिए उसका आकर्षण पूरी तरह से नष्ट हो जाता है। इस प्रकार के आकर्षण के कारण ही व्यक्ति इस भौतिक संसार से अत्यधिक आसक्त हो जाता है। यह हृदय के भीतर एक जटिल गाँठ होती है:

पुंसः स्त्रिया मिथुनी-भावमेतं

तयोर्मिथो हृदय-ग्रन्थिम आहुः

अतो गृह-क्षेत्र-सुताप्त-विद्दैः

जनस्य मोऽयमहं मेति

(भागवत 5.5.8)

हर कोई सुखों की प्राप्ति के लिए इस भौतिक संसार में आता है, और इंद्रिय तृप्ति की कठोर गाँठ ही स्त्री और पुरुष के बीच का आकर्षण है। इस आकर्षण के कारण व्यक्ति गृह-क्षेत्र-सुता-आप्त-विद्दै के संदर्भ में भौतिक संसार से अत्यधिक आसक्त हो जाता है - अर्थात, घर, भूमि, बच्चे, मित्र, धन और इस प्रकार आगे। इस प्रकार वह "मैं" और "मेरा" की शारीरिक अवधारणा में उलझ जाता है। हालाँकि, यदि कोई राजा पुरंजना की कहानी को समझता है और समझता है कि कैसे यौन आकर्षण के कारण, पुरंजना अपने अगले जन्म में स्त्री बन गया, तो वह संसार में रहने की प्रक्रिया को भी समझेगा।

विशेष नोट: माधवाचार्य संप्रदाय से संबंधित विजयध्वज तीर्थ के अनुसार, निम्न श्लोकों में से पहले दो इस अध्याय के 45वें श्लोक के बाद आते हैं, और शेष दो श्लोक 79वें श्लोक के बाद आते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)