पुंसः स्त्रिया मिथुनी-भावमेतं
तयोर्मिथो हृदय-ग्रन्थिम आहुः
अतो गृह-क्षेत्र-सुताप्त-विद्दैः
जनस्य मोऽयमहं मेति
(भागवत 5.5.8)
हर कोई सुखों की प्राप्ति के लिए इस भौतिक संसार में आता है, और इंद्रिय तृप्ति की कठोर गाँठ ही स्त्री और पुरुष के बीच का आकर्षण है। इस आकर्षण के कारण व्यक्ति गृह-क्षेत्र-सुता-आप्त-विद्दै के संदर्भ में भौतिक संसार से अत्यधिक आसक्त हो जाता है - अर्थात, घर, भूमि, बच्चे, मित्र, धन और इस प्रकार आगे। इस प्रकार वह "मैं" और "मेरा" की शारीरिक अवधारणा में उलझ जाता है। हालाँकि, यदि कोई राजा पुरंजना की कहानी को समझता है और समझता है कि कैसे यौन आकर्षण के कारण, पुरंजना अपने अगले जन्म में स्त्री बन गया, तो वह संसार में रहने की प्रक्रिया को भी समझेगा।
विशेष नोट: माधवाचार्य संप्रदाय से संबंधित विजयध्वज तीर्थ के अनुसार, निम्न श्लोकों में से पहले दो इस अध्याय के 45वें श्लोक के बाद आते हैं, और शेष दो श्लोक 79वें श्लोक के बाद आते हैं।
