श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  4.29.83 
एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ ।
य: श्रावयेद्य: श‍ृणुयात्स लिङ्गेन विमुच्यते ॥ ८३ ॥
 
 
अनुवाद
हे विदुर, जो भी मनुष्य महान ऋषि नारद द्वारा कहे गए इस आख्यान को सुनता है या दूसरों को सुनाता है, जो जीव के आध्यात्मिक अस्तित्व को समझने से संबंधित है, वह शरीर के भाव से मुक्त हो जाएगा।
 
O Vidura, one who listens to this story told by Narada, or narrates it to others, relating to the understanding of the spiritual existence of the soul, will be freed from the concept of the body-soul.
तात्पर्य
यह भौतिक सृष्टि आत्मा के सपने हैं। वास्तव में, भौतिक दुनिया में सभी अस्तित्व महाविष्णु का सपना है। जैसे ब्रह्म-संहिता में वर्णित है:

यः कारणार्णव-जले भजति स्म योग-निद्राम् अनंत-जगद-अंड-सरोम-कूपः

यह भौतिक दुनिया महाविष्णु के सपने से बनी है। वास्तविक, तार्किक मंच आध्यात्मिक दुनिया है, पर जब आत्मा भगवान की सर्वोच्च शख्सियत की नकल करना चाहता है, तो उसे भौतिक सृष्टि के इस स्वप्नलोक में डाल दिया जाता है। प्रकृति के भौतिक तरीकों के संपर्क में आने के बाद, जीव सूक्ष्म और स्थूल शरीर विकसित करता है। जब जीव उदाहरण के लिए श्री नारद महामुनि या उनके सेवकों से जुड़ने के लिए काफी भाग्यशाली होता है, तो वह भौतिक सृष्टि के इस स्वप्नलोक और जीवन की शारीरिक अवधारणा से मुक्त हो जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)