श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  4.29.82 
तत्रैकाग्रमना धीरो गोविन्दचरणाम्बुजम् ।
विमुक्तसङ्गोऽनुभजन् भक्त्या तत्साम्यतामगात् ॥ ८२ ॥
 
 
अनुवाद
कपिलाश्रम में तपस्या करने के बाद, राजा प्राचीनबर्हि ने समस्त भौतिक पदवियों से पूर्ण मुक्ति पा ली। वो निरंतर भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में लगा रहा और गुणवत्तापूर्ण दृष्टिकोण से भगवान के ही समान आध्यात्मिक पद पर पहुँच गया।
 
By performing tapasya in Kapilashrama, King Prachinbarhi attained complete liberation from all material attributes. He continued to engage in the transcendental loving service of the Lord and qualitatively reached the spiritual position equal to that of the Lord.
तात्पर्य
ऐसे शब्दों में विशिष्ट महत्त्व है जैसे कि 'तत्-साम्यातां अगात्' जो दर्शाते हैं कि राजा ने परमेश्वर जैसी स्थिति या रूप प्राप्त कर लिया। इससे स्पष्ट रूप से सिद्ध हो जाता है कि परमेश्वर सदैव व्यक्ति हैं। अपने निराकार रूप में, वे अपने दिव्य शरीर की किरणें हैं। जब एक जीव आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर लेता है तो वह उसी प्रकार के शरीर को प्राप्त कर लेता है, जिसे सच्चिदानंदविग्रह जाना जाता है। यह आध्यात्मिक शरीर कभी भी भौतिक तत्वों के साथ मेल नहीं खाता है। यद्यपि सांसारिक जीवन में जीव भौतिक तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहं) से घिरा रहता है, वह उनसे सदैव दूर ही रहता है। दूसरे शब्दों में, जीव किसी भी क्षण सांसारिक स्थिति से मुक्त किया जा सकता है, बशर्ते कि वह ऐसा करने की इच्छा रखता हो। भौतिक पर्यावरण को माया कहा जाता है। कृष्ण के अनुसार:

"दैवी ह्येषा गुणमयी

मम माया दुरत्यया

माम एवे प्रपद्यन्ते

मायामेतां तरन्ति ते"

"मातृका प्रकृति से बना मेरा यह दिव्य ऊर्जा का रूप पार पाना कठिन है। किंतु जिन्होंने मुझे शरणागत किया है वे आसानी से इसे पार कर सकते हैं।" (भ गीता 7.14)

जैसे ही जीव भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होता है, वह तुरंत सभी भौतिक स्थितियों से मुक्त हो जाता है (स गुणान समतित्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते)। भौतिक स्थिति में जीव जीवाभूत प्लेटफॉर्म पर होता है, पर जब वह भगवान की भक्ति सेवा करता है, तो वह ब्रह्मभूत प्लेटफॉर्म तक पहुँच जाता है। ब्रह्मभूत प्लेटफॉर्म पर जीव भौतिक बंधन से मुक्त हो जाता है और वह भगवान की सेवा में संलग्न होता है। इस छंद में शब्द 'धीर' को कभी-कभी 'वीर' के रूप में पढ़ा जाता है। वास्तव में इसमें बहुत अधिक अंतर नहीं है। शब्द 'धीर' का अर्थ है "संयमी", और वीर का अर्थ है "नायक"। जो माया से संघर्ष कर रहा है वह एक नायक है, और जो अपनी स्थिति को समझने के लिए पर्याप्त रूप से संयमी है वह एक धीर है। संयमी या वीर बने बिना कोई भी आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)