"दैवी ह्येषा गुणमयी
मम माया दुरत्यया
माम एवे प्रपद्यन्ते
मायामेतां तरन्ति ते"
"मातृका प्रकृति से बना मेरा यह दिव्य ऊर्जा का रूप पार पाना कठिन है। किंतु जिन्होंने मुझे शरणागत किया है वे आसानी से इसे पार कर सकते हैं।" (भ गीता 7.14)
जैसे ही जीव भगवान की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न होता है, वह तुरंत सभी भौतिक स्थितियों से मुक्त हो जाता है (स गुणान समतित्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते)। भौतिक स्थिति में जीव जीवाभूत प्लेटफॉर्म पर होता है, पर जब वह भगवान की भक्ति सेवा करता है, तो वह ब्रह्मभूत प्लेटफॉर्म तक पहुँच जाता है। ब्रह्मभूत प्लेटफॉर्म पर जीव भौतिक बंधन से मुक्त हो जाता है और वह भगवान की सेवा में संलग्न होता है। इस छंद में शब्द 'धीर' को कभी-कभी 'वीर' के रूप में पढ़ा जाता है। वास्तव में इसमें बहुत अधिक अंतर नहीं है। शब्द 'धीर' का अर्थ है "संयमी", और वीर का अर्थ है "नायक"। जो माया से संघर्ष कर रहा है वह एक नायक है, और जो अपनी स्थिति को समझने के लिए पर्याप्त रूप से संयमी है वह एक धीर है। संयमी या वीर बने बिना कोई भी आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता है।
