मय्य ९सक्त-मनाः पार्य
योगं युंजान मद्-आश्रयः
असंशयं समग्रंमां
यथा ज्ञातस्सायि तच्छृणु
"अब सुनो, हे पृथा के पुत्र [अर्जुन], कैसे मेरी पूर्ण चेतना में योग का अभ्यास करके, मुझसे जुड़े हुए मन से, तुम मुझे संदेह से मुक्त होकर पूर्ण रूप से जान सकते हो।"
जब हम कृष्ण भावना से ओतप्रोत होने के लिए भगवान की भक्ति सेवा में खुद को व्यस्त करते हैं, तो हम न केवल कृष्ण को समझते हैं बल्कि कृष्ण से जुड़ी हर चीज को समझते हैं। दूसरे शब्दों में, कृष्ण चेतना के माध्यम से हम न केवल कृष्ण और ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति को समझ सकते हैं बल्कि हमारी संवैधानिक स्थिति को भी समझ सकते हैं। कृष्ण चेतना में हम समझ सकते हैं कि संपूर्ण भौतिक सृष्टि भगवान द्वारा निर्मित, उनके द्वारा बनाए रखी गई, उनके द्वारा नष्ट की गई और उनके द्वारा अवशोषित की गई है। हम भी भगवान का अभिन्न अंग हैं। सब कुछ भगवान के नियंत्रण में है, और इसलिए हमारा एकमात्र कर्तव्य परम का आत्मसमर्पण करना और उनकी अलौकिक प्रेममय सेवा में संलग्न होना है।
