श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  4.29.79 
अतस्तदपवादार्थं भज सर्वात्मना हरिम् ।
पश्यंस्तदात्मकं विश्वं स्थित्युत्पत्त्यप्यया यत: ॥ ७९ ॥
 
 
अनुवाद
तुम्हें हर समय यह जानना चाहिए कि यह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति भगवान के इच्छा से बनाई गई है, उसे बनाये रखा गया है और उसे नष्ट किया जाता है। इसलिए, इस ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के भीतर सब कुछ भगवान के नियंत्रण में है। इस पूर्ण ज्ञान से प्रकाशित होने के लिए, व्यक्ति को सदैव भगवान की भक्ति सेवा में संलग्न रहना चाहिए।
 
You should always know that the creation, sustenance and destruction of this visible world is done by the will of the Lord. Consequently, all things in this visible world are under the control of the Lord. To attain enlightenment from this complete knowledge, one should always remain engaged in devotional service to the Lord.
तात्पर्य
आत्म-साक्षात्कार, खुद को ब्रह्म या आध्यात्मिक आत्मा के रूप में समझना, भौतिक स्थिति में बहुत कठिन है। हालाँकि, यदि हम भगवान की भक्ति सेवा स्वीकार करते हैं, तो भगवान धीरे-धीरे खुद को प्रकट करेंगे। इस तरह, प्रगतिशील भक्त धीरे-धीरे अपनी आध्यात्मिक स्थिति का एहसास करेंगे। हम रात के अँधेरे में कुछ भी नहीं देख सकते, खुद को भी नहीं, लेकिन जब धूप होती है तो हम न केवल सूर्य को देख सकते हैं बल्कि दुनिया के भीतर सब कुछ देख सकते हैं। भगवान कृष्ण भगवद-गीता (7.1) के सातवें अध्याय में बताते हैं:

मय्य ९सक्त-मनाः पार्य

योगं युंजान मद्-आश्रयः

असंशयं समग्रंमां

यथा ज्ञातस्सायि तच्छृणु

"अब सुनो, हे पृथा के पुत्र [अर्जुन], कैसे मेरी पूर्ण चेतना में योग का अभ्यास करके, मुझसे जुड़े हुए मन से, तुम मुझे संदेह से मुक्त होकर पूर्ण रूप से जान सकते हो।"

जब हम कृष्ण भावना से ओतप्रोत होने के लिए भगवान की भक्ति सेवा में खुद को व्यस्त करते हैं, तो हम न केवल कृष्ण को समझते हैं बल्कि कृष्ण से जुड़ी हर चीज को समझते हैं। दूसरे शब्दों में, कृष्ण चेतना के माध्यम से हम न केवल कृष्ण और ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति को समझ सकते हैं बल्कि हमारी संवैधानिक स्थिति को भी समझ सकते हैं। कृष्ण चेतना में हम समझ सकते हैं कि संपूर्ण भौतिक सृष्टि भगवान द्वारा निर्मित, उनके द्वारा बनाए रखी गई, उनके द्वारा नष्ट की गई और उनके द्वारा अवशोषित की गई है। हम भी भगवान का अभिन्न अंग हैं। सब कुछ भगवान के नियंत्रण में है, और इसलिए हमारा एकमात्र कर्तव्य परम का आत्मसमर्पण करना और उनकी अलौकिक प्रेममय सेवा में संलग्न होना है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)