श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  4.29.78 
यदाक्षैश्चरितान् ध्यायन् कर्माण्याचिनुतेऽसकृत् ।
सति कर्मण्यविद्यायां बन्ध: कर्मण्यनात्मन: ॥ ७८ ॥
 
 
अनुवाद
जो समय तक हम इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं कर पर कार्य करते रहते हैं, तब तक हम भौतिक गतिविधियों में लगे रहते हैं। जीव जब भौतिक क्षेत्र में कार्य करता है तो इंद्रियों का भोग करता है और उस भोग से आगे और भौतिक क्रियाओं की श्रृंखला उत्पन्न करता है। इस प्रकार जीव बंधन के रूप में प्रेरित आत्मा में परिवर्तित हो जाता है।
 
As long as we desire to enjoy sense pleasures, we continue to create material activities. When a living entity acts in the material realm, he enjoys the senses and by doing so he gives rise to another chain of material activities. Thus the living entity becomes bound as a conditioned soul.
तात्पर्य
सूक्ष्म शरीर रहते हुए, हम अपने इंद्रियों के संतुष्टि के लिए कई योजनाएं बनाते हैं। ये योजनाएं हमारे मन की पट्टी पर बीजा के रूप में दर्ज हो जाते हैं, जो कि कर्म-कांड का फल होता है। किये हुए कर्म के कारण जीव एक के बाद एक कई शरीरों के सृजन का कारण बनता है। इसे कर्म बंध कहते हैं। जैसा कि भगवद गीता (3.9) में बताया गया है, यज्ञार्थ कर्माणो अन्यत्र लोको अयं कर्म बंधनः: यदि हम केवल विष्णु की संतुष्टि के लिए कार्य करते हैं, तो भौतिक गतिविधियों के कारण कोई बंधन नहीं होता है, लेकिन यदि हम अन्यथा कार्य करते हैं, तो हम एक के बाद एक भौतिक गतिविधि द्वारा फँसा लिए जाते हैं। इन परिस्थितियों में, यह माना जाता है कि सोच, भावना और इच्छा से हम भविष्य के भौतिक शरीरों की एक श्रृंखला बना रहे हैं। भक्तिविनोद ठाकुर के शब्दों में, अनादि कर्म-फले, पड़ी भवार्णव-जाले: जीव पिछले भौतिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप कर्म-बंधन के महासागर में गिरता है। अपने आप को भौतिक गतिविधियों के समुद्र में न डालने के बजाय, शरीर और आत्मा को एक साथ बनाए रखने के लिए केवल भौतिक गतिविधि को स्वीकार करना चाहिए। किसी के बाकी समय को भगवान की पारलौकिक प्रेममयी सेवा में लगाना चाहिए। इस तरह से कोई भी भौतिक गतिविधि के प्रतिक्रियाओं से राहत पा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)