ममैवांशो जीव-लोके
जीव-भूतः सनातनः
मनः-षष्ठानीन्द्रियाणि
प्रकृति-स्थाणि कर्षति
"इस संसार में जीव मेरा ही अंश है, वह सनातन है। प्रकृति के अधीन रहकर मन और छहों इंद्रियों से जीव बहुत कष्ट उठाता है।" यहाँ यह भी बताया गया है कि जीव सोलह तत्वों के संपर्क में आया और प्रकृति के तीनों गुणों से प्रभावित हुआ। जीव और तत्वों का यह योग जीव-भूत कहलाता है जो प्रकृति में कष्ट उठाता है। सम्पूर्ण भौतिक सत्ता को पहले प्रकृति के तीनों गुणों से उत्तेजित किया जाता है, और यह जीव के जीवन की स्थितियाँ बन जाती हैं। इस तरह सूक्ष्म और स्थूल शरीर विकसित होते हैं, और तत्व मिट्टी, पानी, आग, हवा, आकाश आदि हैं। श्री माधवाचार्य के अनुसार, जब हृदय में चेतना जो जीवन शक्ति है, प्रकृति के तीनों गुणों से उत्तेजित होती है तो जीव का सूक्ष्म शरीर, जो मन, इंद्रियों के विषय, ज्ञान प्राप्त करने वाली पांचों इंद्रियां और भौतिक स्थिति में कार्य करने वाली पाँच इंद्रियों से मिलकर बना है, बनता है।
