श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  4.29.74 
एवं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिवृत् षोडश विस्तृतम् ।
एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥ ७४ ॥
 
 
अनुवाद
पाँच इंद्रियों के विषय, पाँचों कर्म इंद्रियाँ, पाँचों ज्ञान इंद्रियाँ और मन - यह सोलह भौतिक विस्तार है। यह सभी जीव के साथ जुड़े रहते हैं और प्रकृति के तीनों गुणों से प्रभावित होते हैं। इस प्रकार बद्ध आत्मा के अस्तित्व को समझा जाता है।
 
The five sense organs, the five organs of action, the five organs of knowledge and the mind—these are the sixteen material extensions. All these remain associated with the living entity and are affected by the three modes of nature. Thus the existence of the conditioned soul is understood.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण भागवद गीता (15.7 ) में कहते हैं:

ममैवांशो जीव-लोके

जीव-भूतः सनातनः

मनः-षष्ठानीन्द्रियाणि

प्रकृति-स्थाणि कर्षति

"इस संसार में जीव मेरा ही अंश है, वह सनातन है। प्रकृति के अधीन रहकर मन और छहों इंद्रियों से जीव बहुत कष्ट उठाता है।" यहाँ यह भी बताया गया है कि जीव सोलह तत्वों के संपर्क में आया और प्रकृति के तीनों गुणों से प्रभावित हुआ। जीव और तत्वों का यह योग जीव-भूत कहलाता है जो प्रकृति में कष्ट उठाता है। सम्पूर्ण भौतिक सत्ता को पहले प्रकृति के तीनों गुणों से उत्तेजित किया जाता है, और यह जीव के जीवन की स्थितियाँ बन जाती हैं। इस तरह सूक्ष्म और स्थूल शरीर विकसित होते हैं, और तत्व मिट्टी, पानी, आग, हवा, आकाश आदि हैं। श्री माधवाचार्य के अनुसार, जब हृदय में चेतना जो जीवन शक्ति है, प्रकृति के तीनों गुणों से उत्तेजित होती है तो जीव का सूक्ष्म शरीर, जो मन, इंद्रियों के विषय, ज्ञान प्राप्त करने वाली पांचों इंद्रियां और भौतिक स्थिति में कार्य करने वाली पाँच इंद्रियों से मिलकर बना है, बनता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)