जब जीव स्वप्न देखता है, तो इंद्रिय-विषय वास्तव में उपस्थित नहीं होते। लेकिन, जब किसी व्यक्ति का इंद्रिय-विषयों के साथ संपर्क होता है, तो वे प्रकट हो जाते हैं। इसी तरह, अविकसित इंद्रियाँ वाला जीव भौतिक रूप से मौजूद होना बंद नहीं करता, भले ही वह इंद्रिय-विषयों के संपर्क में न हो।
When a being dreams, the sense objects are not actually present. But when a person comes into contact with the sense objects, they become visible. Similarly, a being with undeveloped senses does not cease to exist physically, even if he is not in contact with the sense objects.
तात्पर्य
कभी-कभी यह कहा जाता है कि क्योंकि एक बच्चा निर्दोष है वह पूरी तरह से पवित्र होता है। वास्तव में यह सत्य नहीं है। सूक्ष्म शरीर में संचित काम फल की गतिविधियों के प्रभाव तीन समवर्ती चरणों में प्रकट होते हैं। एक बीज (जड़) कहलाता है, दूसरा कूट-स्थ (इच्छा) कहलाता है, और तीसरा फलोनमुख (फलने को तैयार) कहलाता है। प्रकट अवस्था को प्रारब्ध (पहले से ही क्रिया में) कहा जाता है। सचेत या अचेतन अवस्था में, सूक्ष्म या स्थूल शरीरों की क्रियाएँ प्रकट नहीं हो सकतीं, लेकिन ऐसी स्थितियों को मुक्त अवस्था नहीं कहा जा सकता। एक बच्चा निर्दोष हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह एक मुक्त आत्मा है। सब कुछ संचित रूप में रखा जाता है, और समय के साथ सब कुछ प्रकट होगा। सूक्ष्म शरीर में कुछ अभिव्यक्तियों की अनुपस्थिति में भी, इंद्रिय भोग की वस्तुएँ कार्य कर सकती हैं। निशाचर उत्सर्जन का उदाहरण दिया गया है, जिसमें शारीरिक इंद्रियाँ तब भी कार्य करती हैं जब भौतिक वस्तुएँ प्रकट नहीं होती हैं। भौतिक प्रकृति के तीनों गुण सूक्ष्म शरीर में प्रकट नहीं हो सकते हैं, लेकिन तीनों गुणों का संदूषण संरक्षित रहता है, और समय के साथ, यह प्रकट हो जाता है। भले ही सूक्ष्म और स्थूल शरीरों की प्रतिक्रियाएँ प्रकट न हों, लेकिन व्यक्ति भौतिक स्थितियों से मुक्त नहीं होता है। इसलिए यह कहना गलत है कि एक बच्चा मुक्त आत्मा के समान है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥