श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  4.29.71 
सुप्तिमूर्च्छोपतापेषु प्राणायनविघातत: ।
नेहतेऽहमिति ज्ञानं मृत्युप्रज्वारयोरपि ॥ ७१ ॥
 
 
अनुवाद
जब प्राणी गहरी निद्रा, मूर्छा, किसी गंभीर क्षति से उत्पन्न भारी सदमे, मृत्यु के समय या तेज ज्वर की स्थिति में होता है, तो प्राण-वायु का संचरण रुक जाता है। उस समय जीव आत्मा से शरीर की पहचान करने का ज्ञान खो देता है।
 
When a living being is in deep sleep, unconsciousness, severe shock due to some serious injury, at the time of death or in a state of high fever, then the circulation of vital air stops. At that time the living being loses the knowledge of identifying the body with the soul.
तात्पर्य
मूर्ख लोग आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार करते हैं, लेकिन यह तथ्य है कि जब हम सोते हैं तो हम भौतिक शरीर की पहचान भूल जाते हैं और जब हम जागते हैं तो हम सूक्ष्म शरीर की पहचान भूल जाते हैं। दूसरे शब्दों में, सोते समय हम स्थूल शरीर की गतिविधियों को भूल जाते हैं, और जब स्थूल शरीर में सक्रिय होते हैं तो हम सोने की गतिविधियों को भूल जाते हैं। वास्तव में, सोना और जागना - दोनों ही भ्रमपूर्ण ऊर्जा की रचनाएँ हैं। जीवित प्राणी का वास्तव में न तो नींद की गतिविधियों से और न ही तथाकथित जागृत अवस्था की गतिविधियों से कोई संबंध है। जब कोई व्यक्ति गहरी नींद में या जब वह बेहोश हो जाता है, तो वह अपने स्थूल शरीर को भूल जाता है। इसी तरह, क्लोरोफॉर्म या किसी अन्य एनेस्थेटिक के तहत, जीवित प्राणी अपने स्थूल शरीर को भूल जाता है और सर्जिकल ऑपरेशन के दौरान दर्द या सुख महसूस नहीं करता है। इसी तरह, जब किसी व्यक्ति को अचानक किसी बड़े नुकसान से झटका लगता है, तो वह स्थूल शरीर के साथ अपनी पहचान भूल जाता है। मृत्यु के समय, जब शरीर का तापमान 107 डिग्री तक बढ़ जाता है, तो जीवित प्राणी कोमा में चला जाता है और अपने स्थूल शरीर की पहचान नहीं कर पाता है। ऐसे मामलों में, शरीर के भीतर चलने वाली जीवन वायु घुट जाती है, और जीवित प्राणी स्थूल शरीर के साथ अपनी पहचान भूल जाता है। आध्यात्मिक शरीर की हमारी अज्ञानता के कारण, जिसका हमें कोई अनुभव नहीं है, हम आध्यात्मिक शरीर की गतिविधियों को नहीं जानते हैं, और अज्ञानता में हम एक झूठे मंच से दूसरे मंच पर कूदते हैं। हम कभी स्थूल शरीर के संबंध में और कभी सूक्ष्म शरीर के संबंध में कार्य करते हैं। यदि, कृष्ण की कृपा से, हम अपने आध्यात्मिक शरीर में कार्य करते हैं, तो हम स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों को पार कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, हम धीरे-धीरे अपने आप को आध्यात्मिक शरीर के संदर्भ में कार्य करने के लिए प्रशिक्षित कर सकते हैं। जैसा कि नारद-पंचरात्र में कहा गया है, हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्ति रुच्यते: भक्ति सेवा का अर्थ है आध्यात्मिक शरीर और आध्यात्मिक इंद्रियों को भगवान की सेवा में लगाना। जब हम ऐसी गतिविधियों में लगे होते हैं, तो स्थूल और सूक्ष्म शरीर की क्रियाएँ और प्रतिक्रियाएँ समाप्त हो जाती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)