श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.29.7 
बृहद्बलं मनो विद्यादुभयेन्द्रियनायकम् ।
पञ्चाला: पञ्च विषया यन्मध्ये नवखं पुरम् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
ग्यारहवाँ सेवक, जो अन्य सभी का नेतृत्व करता है, मन है। वह कर्मेद्रियों और ज्ञानेन्द्रियों, दोनों का नायक है। पांचाल राज्य वह वातावरण है जिसमें पाँच इंद्रियों के विषयों का आनंद लिया जाता है। इस पांचाल राज्य के भीतर शरीर रूपी नगर है, जिसमें नौ द्वार (छिद्र) हैं।
 
The eleventh servant, who is the leader of the others, is called the mind. He is the leader of both the organs of action and the organs of knowledge. The Panchala kingdom is the environment in which the five sense-objects (objects) are enjoyed. Within this Panchala kingdom is the city in the form of the body, which has nine gates (holes).
तात्पर्य
मन सभी क्रियाओं का केन्द्र होता है और इसको यहां बृहद्-बल, बहुत शक्तिशाली के रूप में वर्णित किया है। माया ( भौतिक अस्तित्व ) के पंजों से मुक्त होने के लिए, किसी को अपने मन को नियंत्रित करना होगा। प्रशिक्षण के अनुसार, मन जीवित सत्ता का मित्र और शत्रु है। यदि किसी को एक अच्छा प्रबंधक मिल जाता है, तो उसकी संपत्ति का बहुत अच्छा प्रबंधन होता है, लेकिन यदि प्रबंधक चोर है, तो उसकी संपत्ति नष्ट हो जाती है। इसी तरह, अपने भौतिक, सशर्त अस्तित्व में, जीव अपनी मन को वकील की शक्ति देता है। जैसे, उसके मन द्वारा इंद्रिय विषयों का आनंद लेने में उसके गुमराह किए जाने की संभावना है। इसलिए, श्रील अम्बरीष महाराज ने पहले अपने मन को प्रभु के कमल चरणों पर लगाया (स वैन मनः कृष्ण-पदावरिन्दयोः)। जब मन प्रभु के कमल चरणों पर ध्यान में लगा होता है, तो इंद्रियां नियंत्रित होती हैं। नियंत्रण की इस प्रणाली को यम कहा जाता है, और इसका मतलब है "इंद्रियों को वश में करना।" जो इंद्रियों को वश में कर सकता है, वह गोस्वामी कहलाता है, लेकिन जो मन को नियंत्रित नहीं कर सकता, वह गो-दास कहलाता है। मन इंद्रियों की गतिविधियों को निर्देशित करता है, जो विभिन्न माध्यमों से व्यक्त की जाती हैं, जैसा कि अगले श्लोक में वर्णित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)