ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्व-स्था
मध्ये तिष्ठन्ति राजसः
जघन्य-गुण-वृत्ति-स्था
अधो गच्छन्ति तामसाः
“सात्विक प्रकृति में स्थित व्यक्ति धीरे-धीरे ऊपर की ओर उच्च लोकों को जाते हैं; राजसी प्रकृति में स्थित व्यक्ति धरती पर रहते हैं; और तामसी प्रकृति में स्थित व्यक्ति नारकीय लोकों में जाते हैं।”
यदि कोई व्यक्ति सात्विक प्रकृति में है, तो उसकी मानसिक गतिविधियाँ उसे उच्च लोकों में ले जाएंगी। इसी तरह, यदि उसकी मानसिकता अधम है, तो उसका भविष्य का जीवन अत्यंत घृणित होगा। मानसिक स्थिति से जीव की चाहे अतीत हो या भविष्य, उसकी पहचान होती है। नारद मुनि यहाँ राजा को सभी शुभ आशीर्वाद दे रहे हैं ताकि राजा किसी भी चीज की इच्छा न करें या इंद्रियों की तृप्ति के लिए योजना न बनाएँ। राजा ने फल देने वाले कर्मकांडों में भाग लिया क्योंकि उसे भविष्य में बेहतर जीवन प्राप्त करने की आशा थी। नारद मुनि चाहते थे कि वह सभी मानसिक मनगढ़ंतो को छोड़ दें। जैसा कि पहले बताया गया है, स्वर्गीय लोकों और नारकीय लोकों में सभी शरीर मानसिक मनगढ़ंत से ही उत्पन्न होते हैं, और भौतिक जीवन के दुख और सुख केवल मानसिक मंच पर ही हैं। वे मन के रथ (मनो-रथ) पर घटित होते हैं। इसलिए कहा जाता है:
यस्यस्ति भक्तिर भगवत्य अकिंचना
सर्वैर् गुणैस्तत्र समासते सुराः
हरौ अभक्तस्य कुतो महद्-गुणा
मनो-रथेनासति धावतो बहिः
“भगवान के व्यक्तित्व के लिए अडिग भक्ति रखने वाले में देवताओं के सभी अच्छे गुण होते हैं। लेकिन जो भगवान का भक्त न हो, उसके पास केवल भौतिक योग्यताएँ होती हैं, जो कि बहुत कम मूल्य की होती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह मानसिक स्तर पर मंडरा रहा है और निश्चित रूप से चकाचौंध भरी भौतिक ऊर्जा से आकर्षित होगा।” (भाग। 5.18.12)
जब तक कोई व्यक्ति भगवान का भक्त या पूर्ण कृष्ण भावनाशील नहीं बन जाता, तब तक वह निश्चित रूप से मानसिक मंच पर ही मंडराता रहेगा और विभिन्न प्रकार के शरीरों में उसे पदोन्नत और अपमानित किया जाएगा। वे सभी गुण जिन्हें भौतिक दृष्टि से अच्छा माना जाता है, वास्तव में उनका कोई मूल्य नहीं है क्योंकि ये तथाकथित अच्छे गुण किसी व्यक्ति को जन्म और मृत्यु के चक्र से नहीं बचाएंगे। निष्कर्ष यह है कि व्यक्ति को मानसिक इच्छा से रहित होना चाहिए। अन्यभिलाषित-शून्यं ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्: व्यक्ति को भौतिक इच्छाओं, दार्शनिक अटकलों और फलदायी गतिविधि से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए। मनुष्य के लिए सबसे अच्छा रास्ता भगवान की पारलौकिक भक्ति सेवा को अनुकूल रूप से स्वीकार करना है। यही मानव जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है।
