श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  4.29.64 
नानुभूतं क्‍व चानेन देहेनाद‍ृष्टमश्रुतम् ।
कदाचिदुपलभ्येत यद्रूपं याद‍ृगात्मनि ॥ ६४ ॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी हमें ऐसी चीज़ का अचानक अनुभव हो जाता है, जिसे हमने अपने वर्तमान शरीर में देख या सुनकर पहले कभी अनुभव नहीं किया होता। कभी-कभी सपने में भी हमें ऐसी चीजें अचानक दिख जाती हैं।
 
Sometimes we suddenly experience such things which we have never seen or heard in this body. Sometimes we suddenly see such things in our dreams.
तात्पर्य
Hindi-Text: हमें सपनों में कई बार ऐसी चीज़ें भी दिखती हैं जो हमने अपने वर्तमान शरीर से कभी अनुभव नहीं की हैं। कई बार सपने में हम खुद को आसमान में उड़ते हुए देखते हैं, हालाँकि वास्तविकता में हमने कभी उड़ान का अनुभव नहीं किया होता है। इसका मतलब है कि पिछले जन्म में हम अर्धदेव या अंतरिक्ष यात्री के रूप में आकाश में उड़े हुए थे। उस अनुभव का निशान हमारे मन की गहराइयों में मौजूद रहता है और एकाएक प्रकट हो जाता है। जैसे पानी की गहराइयों में किण्वन होने पर बुलबुले पानी की सतह पर दिखने लगते हैं, कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी होता है। कभी-कभी हम सपने में ऐसी किसी जगह पर खुद को पाते हैं जिसे हमने इस जन्म में कभी जाना या महसूस नहीं किया है, पर इससे पता चलता है कि पिछले जन्म में हम उस चीज़ का अनुभव कर चुके हैं। उस अनुभव का निशान हमारे मन में बना रहता है और कई बार सपने में या विचारों के रूप में खुद को प्रकट कर देता है। इस सबका निष्कर्ष यही है कि हमारा मन हमारे पिछले जन्मों में किए गए विचारों और अनुभवों का भंडार है। इस प्रकार एक जीवन से दूसरे जीवन तक, पिछले जन्मों से इस जन्म तक और इस जन्म से भविष्य के जन्मों तक एक सिलसिला जुड़ा हुआ है। इसी को इस कहावत से भी समझाया जाता है कि कोई व्यक्ति जन्मजात कवि, जन्मजात वैज्ञानिक या जन्मजात भक्त होता है। अगर हम इस जीवन में भी महाराजा अम्बरीष की तरह लगातार कृष्ण का ध्यान करते हैं (स व म्नः कृष्ण-पदरविंदयोः), तो हम निश्चित रूप से मृत्यु के समय ईश्वर के राज्य में स्थानांतरित हो जाएँगे। अगर कृष्ण-भावना में हमारा यह प्रयास पूर्ण न भी हो पाए तो भी हमारी कृष्ण-भावना अगले जन्म में भी जारी रहेगी। भगवद गीता (6.41) में इसकी पुष्टि की गई है:

प्राप्य पुण्य-कृतँ लोकान्

उषित्वा शाश्वती: समा:

शुचीनाम् श्रीमतां गेहे

योग-भ्रष्टोभिजायाते

""असफल योगी पुण्यात्मा जीवों के ग्रहों पर कई-कई साल तक विहार करने के बाद धार्मिक लोगों के परिवार में या सम्पन्न कुलीन परिवार में जन्म लेता है।""

अगर हम कृष्ण पर ध्यान के सिद्धांतों का पूरी दृढ़ता के साथ पालन करते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगले जन्म में हम कृष्णलोक गोलोक वृन्दावन में स्थानांतरित हो जाएँगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)