श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  4.29.63 
यथानुमीयते चित्तमुभयैरिन्द्रियेहितै: ।
एवं प्राग्देहजं कर्म लक्ष्यते चित्तवृत्तिभि: ॥ ६३ ॥
 
 
अनुवाद
जीवों की मानसिक स्थिति उनके कार्य करने की शक्तियों के रूप में काम करने वाली इंद्रियों तथा ज्ञान प्राप्त करने वाली इंद्रियों के कार्य के अनुसार निर्धारित की जा सकती है। उसी प्रकार, किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति या चेतना से उसके पिछले जन्म की स्थिति को समझा जा सकता है।
 
The mental state of a living being can be understood through two types of senses- the organs of action and the organs of knowledge. Similarly, the state of a person's previous birth can be understood from his mental state.
तात्पर्य
एक कहावत है जो कहती है कि "चेहरा मन का सूचक है।" यदि कोई गुस्से में है तो उसका गुस्सा तुरंत उसके चेहरे पर दिख जाता है। इसी तरह, शरीर की हरकतों से भी मन के भावों का पता चलता है। दूसरे शब्दों में, शरीर की हरकतें मन की स्थिति की प्रतिक्रियाएँ होती हैं। मन की गतिविधियाँ -सोचने, भावना करने और इच्छा करने की हैं। मन का इच्छा करने वाला हिस्सा शरीर की हरकतों द्वारा प्रकट होता है। निष्कर्ष यह है कि शरीर और इंद्रियों की गतिविधियों द्वारा, हम मन की स्थिति को समझ सकते हैं। मन की स्थिति पिछले शरीर में पिछली गतिविधियों से प्रभावित होती है। जब मन किसी विशेष इंद्री से जुड़ जाता है तो वह तुरंत एक निश्चित तरीके से प्रकट हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब मन में क्रोध होता है, तो जीभ बहुत से अभिशापों से कांपती है। इसी तरह, जब मन का क्रोध हाथ से व्यक्त होता है, तब लड़ाई होती है। जब इसे पैर से व्यक्त किया जाता है, तो लात मारी जाती है। ऐसे कई तरीके हैं जिनसे मन की सूक्ष्म गतिविधियाँ विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से व्यक्त की जाती हैं। कृष्ण भावना में एक व्यक्ति का मन भी इसी तरह से कार्य करता है। जीभ हरे कृष्ण, महा-मंत्र का जाप करती है, हाथ आनंद में उठते हैं, और पैर कृष्ण भावना में नाचते हैं। इन लक्षणों को तकनीकी रूप से अष्ट-सात्त्विक-विकार कहा जाता है। सात्विक-विकार में मानसिक स्थिति का सद्गुण या कभी-कभी पारलौकिक आनंद में परिवर्तन होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)