सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं ca
अगले जन्म में, मनुष्य सर्वव्यापी आत्मा से स्मरण प्राप्त करके और पिछले जीवन में प्रारंभ की गई अपनी योजनाओं को कार्यरूप देना प्रारंभ कर देता है। भगवद्गीता में भी इसी बात को दूसरे श्लोक में समझाया गया है:
ईश्वरः सर्वभूतानां
हृद्देशेअर्जुन तिष्ठति
भ्रामयन सर्वभूतानि
यंत्रारूढानि मायया
"हे अर्जुन, परमेश्वर सबके हृदय में स्थित है और सब जीवों की यात्रा का निर्देशन कर रहा है, जो प्रकृति की सत्ता से बनी हुई मशीन पर सवार हैं।" (भगवद्गीता 18.61) प्रकृति द्वारा दिए हुए वाहन पर सवार होकर और हृदय में स्थित सर्वव्यापी आत्मा द्वारा स्मरण दिलाए जाने पर, जीव अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए पूरे ब्रह्मांड का भ्रमण करता रहता है। वह सोचता है कि, "मैं एक ब्राह्मण हूँ," "मैं एक क्षत्रिय हूँ," "मैं एक अमेरिकन हूँ," "मैं एक भारतीय हूँ," और इसी प्रकार। पदवी के ये सारे भेद एक ही तत्व से हैं। एक अमेरिकन होने की अपेक्षा ब्राह्मण बनने में कोई लाभ नहीं है या एक नीग्रो की अपेक्षा अमेरिकन बनने में कोई लाभ नहीं है। अंत में, ये सभी भौतिक प्रकृति की प्रक्रियाओं के अंतर्गत देहधारी भाव ही हैं।
