चूँकि आधुनिक वैज्ञानिक और दार्शनिक बहुत भौतिकवादी हैं, और चूँकि उनका ज्ञान मायावी ऊर्जा द्वारा दूर ले जाया गया है, वे यह नहीं समझा सकते कि स्थूल शरीर कैसे बदल रहा है। भौतिकवादी दार्शनिक डार्विन ने स्थूल शरीर के परिवर्तनों का अध्ययन करने की कोशिश की है, लेकिन क्योंकि उसे सूक्ष्म शरीर या आत्मा का कोई ज्ञान नहीं था, वह स्पष्ट रूप से यह नहीं समझा पाया कि विकासवादी प्रक्रिया कैसे चल रही है। कोई अपना स्थूल शरीर बदल सकता है, लेकिन वह सूक्ष्म शरीर में कार्य करता है। लोग सूक्ष्म शरीर की गतिविधियों को समझ नहीं पाते हैं, और इसलिए वे चकित रह जाते हैं कि कैसे एक स्थूल शरीर की क्रियाएँ दूसरे स्थूल शरीर को प्रभावित करती हैं। सूक्ष्म शरीर की गतिविधियाँ भी परमात्मा द्वारा निर्देशित होती हैं, जैसा कि भगवद्-गीता (15.15) में बताया गया है:
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम् अपोहनं च
"मैं हर किसी के हृदय में विराजमान हूँ, और मुझसे स्मरण, ज्ञान और विस्मरण आता है।"
क्योंकि भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व परमात्मा सर्वव्यापी आत्मा के रूप में सदा व्यक्तिगत आत्मा का मार्गदर्शन कर रहे हैं, व्यक्तिगत आत्मा हमेशा जानता है कि अपने अतीत कर्मों की प्रतिक्रियाओं के अनुसार कैसे कार्य करना है। दूसरे शब्दों में, सर्वव्यापी आत्मा उसे इस तरह से कार्य करने के लिए याद दिलाती है। इसलिए, हालांकि स्थूल शरीर में स्पष्ट रूप से परिवर्तन होता है, एक व्यक्तिगत आत्मा के जीवन के बीच एक निरंतरता होती है।
