निकट-स्थ माया तारे जापटिया धरे
(प्रेम-विवर्त)
भौतिक जगत के भोग-सुख की इच्छा के कारण जीव को भौतिक स्थूल और सूक्ष्म शरीर पहनाए जाते हैं। इस तरह उसे इंद्रियों के भोग करने का मौका दिया जाता है। इसलिए इंद्रियां भौतिक जगत को भोगने के साधन हैं; नतीजतन इंद्रियों को मित्र बताया गया है। कभी-कभी पाप कर्म बहुत अधिक हो जाने के कारण जीव को भौतिक स्थूल शरीर नहीं मिलता, बल्कि वह सूक्ष्म पटल पर भटकता रहता है। इसे प्रेत जीवन कहा जाता है। स्थूल शरीर के अभाव में वह अपने सूक्ष्म शरीर में बहुत कष्ट उठाते हैं। इसलिए किसी भूत की उपस्थिति स्थूल शरीर में रहने वालों के लिए भयानक होती है। जैसा कि भगवद-गीता (15.10) में कहा गया है:
उत्क्रमन्तं स्थितं वापि
भुंजानं वा गुणान्वितम्
विमुढा नानुपश्यन्ति
पश्यन्ति ज्ञान-चक्षुषः
"मूर्ख यह नहीं समझ सकते कि एक जीव अपनी देह का त्याग कैसे कर सकता है और न ही वे समझ सकते हैं कि प्रकृति के गुणों के प्रभाव में वह किस प्रकार के शरीर का भोग करता है। लेकिन जिसकी आंखें ज्ञान में प्रशिक्षित हैं, वह यह सब देख सकता है।"
जीव जीवन की वायु में विलीन हो जाते हैं, जो परिसंचरण के लिए अलग-अलग तरीकों से कार्य करती है। प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान हैं, और क्योंकि जीवन की हवा इस पंचगुनी तरह से कार्य करती है, इसलिए इसकी तुलना पांच फन वाले सांप से की जाती है। आत्मा कुंडलिनी-चक्र से होकर गुजरती है जैसे कि ज़मीन पर रेंगता हुआ साँप। जीवन की हवा की तुलना उरगा यानी सांप से की जाती है। पंच-वृत्ति इन्द्रियों को संतुष्ट करने की इच्छा है, जो पाँच इन्द्रिय विषयों, अर्थात् रूप, स्वाद, ध्वनि, गंध और स्पर्श से आकर्षित होती है।
