श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.29.6 
सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम् ।
सख्यस्तद्वृत्तय: प्राण: पञ्चवृत्तिर्यथोरग: ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ पुरञ्जनी के पुरुष मित्र हैं। ये इन्द्रियाँ जीव को ज्ञान प्राप्त करने और गतिविधि में संलग्न होने में सहायता करती हैं। इन्द्रियों की व्यस्तताएँ उसकी सखियाँ हैं, और वह सर्प, जिसे पाँच फनों वाला बताया गया है, पाँच संचार प्रक्रियाओं के भीतर काम करने वाली जीवन वायु है।
 
The five sense organs and the five organs of action are the male friends of Puranjani. The living being is helped by these sense organs to acquire knowledge and to engage in work. The activities of the sense organs are her friends and the serpent which is said to have five hoods is the vital breath working within the five types of activities.
तात्पर्य
कृष्ण-बहिर्मुख हंन भोग-वांचा करे

निकट-स्थ माया तारे जापटिया धरे

(प्रेम-विवर्त)

भौतिक जगत के भोग-सुख की इच्छा के कारण जीव को भौतिक स्थूल और सूक्ष्म शरीर पहनाए जाते हैं। इस तरह उसे इंद्रियों के भोग करने का मौका दिया जाता है। इसलिए इंद्रियां भौतिक जगत को भोगने के साधन हैं; नतीजतन इंद्रियों को मित्र बताया गया है। कभी-कभी पाप कर्म बहुत अधिक हो जाने के कारण जीव को भौतिक स्थूल शरीर नहीं मिलता, बल्कि वह सूक्ष्म पटल पर भटकता रहता है। इसे प्रेत जीवन कहा जाता है। स्थूल शरीर के अभाव में वह अपने सूक्ष्म शरीर में बहुत कष्ट उठाते हैं। इसलिए किसी भूत की उपस्थिति स्थूल शरीर में रहने वालों के लिए भयानक होती है। जैसा कि भगवद-गीता (15.10) में कहा गया है:

उत्क्रमन्तं स्थितं वापि

भुंजानं वा गुणान्वितम्

विमुढा नानुपश्यन्ति

पश्यन्ति ज्ञान-चक्षुषः

"मूर्ख यह नहीं समझ सकते कि एक जीव अपनी देह का त्याग कैसे कर सकता है और न ही वे समझ सकते हैं कि प्रकृति के गुणों के प्रभाव में वह किस प्रकार के शरीर का भोग करता है। लेकिन जिसकी आंखें ज्ञान में प्रशिक्षित हैं, वह यह सब देख सकता है।"

जीव जीवन की वायु में विलीन हो जाते हैं, जो परिसंचरण के लिए अलग-अलग तरीकों से कार्य करती है। प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान हैं, और क्योंकि जीवन की हवा इस पंचगुनी तरह से कार्य करती है, इसलिए इसकी तुलना पांच फन वाले सांप से की जाती है। आत्मा कुंडलिनी-चक्र से होकर गुजरती है जैसे कि ज़मीन पर रेंगता हुआ साँप। जीवन की हवा की तुलना उरगा यानी सांप से की जाती है। पंच-वृत्ति इन्द्रियों को संतुष्ट करने की इच्छा है, जो पाँच इन्द्रिय विषयों, अर्थात् रूप, स्वाद, ध्वनि, गंध और स्पर्श से आकर्षित होती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)