श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  4.29.59 
इति वेदविदां वाद: श्रूयते तत्र तत्र ह ।
कर्म यत्क्रियते प्रोक्तं परोक्षं न प्रकाशते ॥ ५९ ॥
 
 
अनुवाद
वेदों के विशेषज्ञ कहते हैं कि व्यक्ति अपने पिछले कर्मों के नतीजे भोगता है या भुगतता है। लेकिन व्यवहारिक रूप से यह देखा गया है कि पिछले जन्म में जिस शरीर ने काम किया था, वह नष्ट हो चुका है। तो उस काम के परिणामों को एक अलग शरीर द्वारा भोगना या भुगतना कैसे संभव है?
 
The Vedists say that man enjoys the fruits of his previous deeds. But in practice it is seen that the body which performed the deeds in the previous birth is destroyed. So how is it possible to enjoy those deeds through a different body?
तात्पर्य
नास्तिक अतीत की गतिविधियों के पफल स्वरूप उत्पन्न होने वाले कर्मों के लिए प्रमाण चाहते हैं। अतः वे पूछते हैं, "इस बात का प्रमाण कहां है कि मैं अपने अतीत के कर्मों के फलस्वरूप दुख और आनंद भोग रहा हूं?" उन्हें इस बात का कोई पता नहीं है कि सूक्ष्म शरीर किस प्रकार वर्तमान शरीर के कर्मों के फल को अपने साथ अगले स्थूल शरीर में ले जाता है। वर्तमान शरीर भले ही स्थूल रूप से समाप्त हो जाए, लेकिन सूक्ष्म शरीर समाप्त नहीं होता; यह आत्मा को अगले शरीर में ले जाता है। वास्तव में स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर पर निर्भर करता है। इसलिए अगले स्थूल शरीर को सूक्ष्म शरीर के अनुसार ही दुख और सुख भोगना होगा। आत्मा को सूक्ष्म शरीर द्वारा लगातार तब तक ढोया जाता है जब तक वह स्थूल भौतिक बंधन से मुक्त नहीं हो जाता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)