श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  4.29.58 
कर्माण्यारभते येन पुमानिह विहाय तम् ।
अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते ॥ ५८ ॥
 
 
अनुवाद
जीवन में किए हुए कर्म का फल प्राणी अगले जन्म में भोगता है।
 
Whatever a living being does in this life, he reaps the consequences in the next life.
तात्पर्य
सामान्यत: व्यक्ति को यह नहीं पता होता कि एक शरीर दूसरे शरीर से कैसे जुडा होता है। इस शरीर में की गई गतिविधियों के फल किसी दूसरे शरीर में अगले जन्म में व्यक्ति भोगता या सुख पाता है, यह कैसे संभव है? यह एक प्रश्न है जिसका राजा नारद मुनि से उत्तर चाहते हैं। इस जीवन में व्यक्ति को मानव शरीर प्राप्त हो सकता है और अगले जन्म में मानव शरीर प्राप्त नहीं हो सकता है, ऐसा कैसे हो सकता है? बड़े-बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक भी एक शरीर के कर्म दूसरे शरीर को कैसे प्राप्त होते हैं, इसका कारण नहीं समझा पाते हैं। जैसा कि हम अनुभव करते हैं, प्रत्येक व्यक्तिगत आत्मा का अपना एक शरीर है और एक व्यक्ति की गतिविधियों या एक शरीर की गतिविधियों का फल किसी दूसरे शरीर या किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा प्राप्त नहीं होता है। प्रश्न यह है कि एक शरीर की गतिविधियों का फल अगले शरीर में कैसे प्राप्त या भोगा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)