श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  4.29.56 
राजोवाच
श्रुतमन्वीक्षितं ब्रह्मन् भगवान् यदभाषत ।
नैतज्जानन्त्युपाध्याया: किं न ब्रूयुर्विदुर्यदि ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
राजा ने उत्तर दिया: मेरे प्रिय ब्राह्मण, आपने जो कुछ कहा है उसे मैंने काफ़ी ध्यानपूर्वक सुना है और उस सब पर विचार करने के बाद, मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि जिन आचार्यों [शिक्षकों] ने मुझे कर्मकांडों में लगाया, वे इस गुप्त ज्ञान से परिचित नहीं थे। अगर वो इससे परिचित थे, तो फिर उन्होंने मुझे ये ज्ञान क्यों नहीं बताया?
 
The king said: O Brahmin, I have listened to what you have said with great attention and after due consideration I have come to the conclusion that the teachers who initiated me into rituals did not know this secret knowledge. And if they were aware of it, then why did they not tell me?
तात्पर्य
वास्तव में भौतिक समाज के तथाकथित शिक्षक या नेता जीवन के लक्ष्य को नहीं जानते। भगवद-गीता में उन्हें मायापहृति-ज्ञानः के रूप में वर्णित किया गया है। वे अत्यधिक विद्वान विद्वान प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में मायावी ऊर्जा का प्रभाव उनके ज्ञान को नष्ट कर चुका है। वास्तविक ज्ञान का अर्थ है कृष्ण की खोज करना (वेदैश्च सर्वैरहं एवा वेद्यः)। सभी वैदिक ज्ञान का उद्देश्य कृष्ण को खोजना है क्योंकि कृष्ण सब कुछ के मूल हैं (जन्मदयः यतः)। भगवद-गीता (10.2) में कृष्ण कहते हैं, अहम् आदिर्हि देवानाम्: "मैं देवताओं का स्रोत हूं।" इस प्रकार कृष्ण भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव और अन्य सभी सहित सभी देवताओं के मूल और आदि हैं। वैदिक कर्मकांड समारोह विभिन्न देवताओं को संतुष्ट करने से संबंधित हैं, लेकिन जब तक कोई बहुत उन्नत नहीं होता, तब तक वह यह नहीं समझ सकता कि मूल व्यक्तित्व श्री कृष्ण (गोविंदम् आदि-पुरुषम तम अहम् भजामि) है। नारद के निर्देशों को सुनने के बाद, राजा बृहष्मण को होश आ गया। जीवन का वास्तविक लक्ष्य भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रति भक्ति सेवा प्राप्त करना है। इसलिए राजा ने तथाकथित पुरोहित आदेशों को अस्वीकार करने का फैसला किया जो केवल अपने अनुयायियों को जीवन के लक्ष्य के बारे में प्रभावी निर्देश दिए बिना अनुष्ठान समारोहों में शामिल करते हैं। वर्तमान समय में दुनिया भर के चर्च, मंदिर और मस्जिदें लोगों को आकर्षित नहीं कर रहे हैं क्योंकि मूर्ख पुजारी अपने अनुयायियों को ज्ञान के मंच तक नहीं पहुँचा सकते। जीवन के वास्तविक लक्ष्य से अनजान, वे बस अपनी मण्डली को अज्ञान में रखते हैं। नतीजतन, जो लोग अच्छी तरह से शिक्षित हैं वे कर्मकांड समारोहों में रुचि नहीं रखते हैं। साथ ही उन्हें वास्तविक ज्ञान से लाभ नहीं होता है। इसलिए यह कृष्ण चेतना आंदोलन सभी वर्गों के ज्ञान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। महाराजा बृहष्मण के पदचिन्हों पर चलते हुए, सभी को इस कृष्ण चेतना आंदोलन का लाभ उठाना चाहिए और रूढ़िवादी अनुष्ठान समारोहों को त्याग देना चाहिए जो कई धर्मों की आड़ में चलते हैं। गोस्वामियों ने शुरू से ही उस पुरोहित वर्ग से अलग थे जो अनुष्ठान समारोहों में लगा हुआ था। वास्तव में, श्रील सनातन गोस्वामी ने वैष्णवों के मार्गदर्शन के लिए अपनी हरि-भक्ति-विलास का संकलन किया। वैष्णव, पुरोहित वर्ग के बेजान कार्यों की परवाह नहीं करते हुए, पूर्ण कृष्ण चेतना को अपनाते हैं और इसी जीवन में पूर्ण हो जाते हैं। यह पिछली कविता में परमहंस-शरणम के रूप में वर्णित है, परमहंस, मुक्त आत्मा की शरण लेना, और इस जीवन में सफल होना।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)