कर्मा-कांड, ज्ञान-कांड, केवल विषरा भांडा,
अमृत बलिए येबा खाए
नाना योनि सदा फिरे, कदर्य भक्षण करे,
तार जन्म अध-पात गए
"सत्कर्म और मानसिक अटकलें केवल जहर के प्याले हैं। जो कोई भी उन्हें अमृत समझकर पीता है, उसे जीवन-दर-जीवन विभिन्न प्रकार के शरीरों में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति हर तरह की बकवास खाता है और तथाकथित इंद्रिय सुख की अपनी गतिविधियों से निंदा करता है।"
लोग आम तौर पर सांसारिक गतिविधियों और मानसिक अटकलों के सत्कर्मों से मोहित हो जाते हैं। वे आम तौर पर स्वर्गीय ग्रहों में पदोन्नत होने, ब्रह्म के अस्तित्व में विलय होने या खुद को पारिवारिक जीवन के बीच में रखने की इच्छा रखते हैं, जो जीभ और जननांगों के सुख से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। महान ऋषि नारद स्पष्ट रूप से राजा बार्हिष्मान को निर्देश देते हैं कि वे अपना पूरा जीवन गृहस्थ-आश्रम में न रहें। गृहस्थ-आश्रम में रहने का अर्थ है अपनी पत्नी के नियंत्रण में रहना। व्यक्ति को यह सब त्यागना होगा और खुद को परमहंस के आश्रम में रखना होगा, अर्थात अपने आप को आध्यात्मिक गुरु के नियंत्रण में रखना होगा। परमहंस-आश्रम भगवान का आश्रम है, जिसके तहत आध्यात्मिक गुरु ने शरण ली है। श्रीमद-भागवतम (11.3.21) में वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के लक्षण बताए गए हैं:
तस्माद गुरु प्रपद्यते
जिज्ञासु श्रेया उत्तमं
शबदे पारे च निष्णातं
ब्रह्माण्य उपशमाश्रयम
"कोई भी व्यक्ति जो वास्तविक सुख प्राप्त करने का गंभीर इच्छुक है, उसे एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की तलाश करनी चाहिए और दीक्षा द्वारा उसे शरण लेना चाहिए। आध्यात्मिक गुरु की योग्यता यह होनी चाहिए कि उसने विचार-विमर्श और तर्कों द्वारा शास्त्रों के निष्कर्ष को समझा हो और इस प्रकार दूसरों को इन निष्कर्षों के बारे में समझाने में सक्षम हो। ऐसे महान व्यक्तित्व, जिन्होंने सभी भौतिक विचारों को त्यागकर भगवान की शरण पूर्ण रूप से ली है, उन्हें वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के रूप में समझा जाना चाहिए।"
एक परमहंस वह है जिसने परब्रह्म, भगवान की शरण ली है। यदि कोई परमहंस आध्यात्मिक गुरु की शरण लेता है, तो धीरे-धीरे, प्रशिक्षण और निर्देश के माध्यम से, वह सांसारिक जीवन से अलग हो जाएगा और अंततः घर वापस भगवान के पास लौट आएगा। अंगनाश्रम असत्तमा-युथ-गथम के विशेष उल्लेख बहुत दिलचस्प है। पूरी दुनिया माया के चंगुल में है, जिसे महिला द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है। न केवल एक महिला द्वारा नियंत्रित किया जाता है जो किसी की पत्नी है, बल्कि कई सेक्स साहित्य द्वारा भी नियंत्रित किया जाता है। यही भौतिक संसार में उलझने का कारण है। कोई व्यक्ति अपने स्वयं के प्रयास से इस घृणित संगति को नहीं त्याग सकता है, परंतु यदि कोई वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की शरण लेता है जो एक परमहंस है, तो वह धीरे-धीरे आध्यात्मिक जीवन के मंच तक ऊंचा हो जाएगा।
वेदों के प्रिय वचन जो लोगों को स्वर्गलोक तक खुद को ऊपर उठाने अथवा परमेश्वर के अस्तित्व के साथ विलीन हो जाने के लिए प्रेरित करते हैं, कम बुद्धिमानों के लिए हैं, जिन्हें भगवद्-गीता में मायापहृत-ज्ञानाह" कहा गया है, ''जिनका ज्ञान माया शक्ति द्वारा छीन लिया गया है।'' वास्तविक ज्ञान का अर्थ भौतिक जीवन की दयनीय स्थिति को समझना है। किसी वास्तविक रूप से मुक्त व्यक्ति आत्मिक गुरु में शरण लेनी चाहिए, और धीरे धीरे आत्मिक स्तर तक ऊपर उठना चाहिए और इस तरह भौतिक दुनिया से अलग होना चाहिए। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, हंस-शरण का वास उस कॉटेज से संबंधित है जिसमे संत लोग रहते हैं। आमतौर पर एक संत वन में एक दूरदराज के स्थान पर या एक विनम्र कॉटेज में रहता है। हालाँकि, हमें ध्यान देना चाहिए कि समय बदल गया है। एक संत व्यक्ति के अपने हित के लिए जंगल में जाकर एक कॉटेज में रहना फायदेमंद हो सकता है, लेकिन अगर कोई उपदेशक बन जाता है, खासकर पश्चिमी देशों में, तो उसे कई वर्गों के लोगों को आमंत्रित करना होता है जो आरामदायक अपार्टमेंट में रहने के आदी हैं। इसलिए इस युग में एक संत व्यक्ति को लोगों को प्राप्त करने और उन्हें कृष्ण चेतना के संदेश की ओर आकर्षित करने के लिए उचित व्यवस्था करनी होती है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर, शायद पहली बार, बड़े शहरों में आम जनता को आकर्षित करने के लिए संतों के निवास के लिए मोटरकार और महलनुमा इमारतों की शुरुआत की। मुख्य तथ्य यह है कि किसी को किसी संत व्यक्ति के साथ रहना होता है। इस युग में लोग जंगल में किसी संत को खोजने नहीं जा रहे हैं, इसलिए संतों और ऋषियों को सामान्य लोगों को प्राप्त करने की व्यवस्था करने के लिए बड़े शहरों में आना होगा, जो भौतिक जीवन की आधुनिक सुख सुविधाओं के आदी हैं। धीरे-धीरे ऐसे लोगों को पता चलेगा कि महलनुमा इमारतें या आरामदायक अपार्टमेंट बिल्कुल भी आवश्यक नहीं हैं। वास्तविक आवश्यकता भौतिक बंधन से मुक्त होना है, जिस भी तरह से संभव हो। श्रील रूप गोस्वामी के आदेशों के अनुसार: अनासक्तस्य विषयान् यथारम उपयुंजतह निर्बंध क्रष्ण-संबंधे युक्त वैराग्यं उच्यते "जब कोई व्यक्ति किसी चीज़ से जुड़ा नहीं है, लेकिन फिर भी कृष्ण के संबंध में हर चीज़ को स्वीकार करता है, तो वह अधिकार के ऊपर सही ढंग से स्थित होता है।" (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.255) किसी को भौतिक वैभव से जुड़ा नहीं होना चाहिए, लेकिन कृष्ण चेतना आंदोलन में भौतिक वैभव को आंदोलन के प्रसार को सुविधाजनक बनाने के लिए स्वीकार किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, भौतिक वैभव को युक्त-वैराग्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, अर्थात त्याग के लिए।
