श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  4.29.54 
सुमन:समधर्मणां स्‍त्रीणां शरण आश्रमे पुष्पमधुगन्धवत्क्षुद्रतमं काम्यकर्मविपाकजं कामसुखलवं जैह्व्यौपस्थ्यादि विचिन्वन्तं मिथुनीभूय तदभिनिवेशितमनसंषडङ्‌घ्रिगणसामगीत वदतिमनोहरवनितादिजनालापेष्वतितरामतिप्रलोभितकर्णमग्रे वृकयूथवदात्मन आयुर्हरतोऽहोरात्रान्तान् काललवविशेषानविगणय्य गृहेषु विहरन्तं पृष्ठत एव परोक्षमनुप्रवृत्तो लुब्धक: कृतान्तोऽन्त:शरेण यमिह पराविध्यति तमिममात्मानमहो राजन् भिन्नहृदयं द्रष्टुमर्हसीति ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजन्, नारी उस फूल के समान है जो आरम्भ में अत्यन्त आकर्षक होती है, परन्तु अन्त में अत्यन्त घृणित हो जाती है। जीव कामेच्छाओं के कारण नारी के साथ फँसता है और संभोग-सुख प्राप्त करता है, जैसे कोई फूलों की सुगंध का आनंद लेता है। वह जिह्वा से लेकर शिश्न तक इन्द्रियों के माध्यम से तृप्ति का जीवन बिताता है और गृहस्थ जीवन में स्वयं को अत्यन्त सुखी मानता है। अपनी पत्नी के साथ रहकर वह सदैव ऐसे विचारों में मग्न रहता है। वह अपनी पत्नी व बच्चों की बातें सुनकर प्रसन्नता अनुभव करता है, जो उन भ्रमरों की मधुर गुंजार के समान होती है जो एक फूल से दूसरे फूल पर मधु एकत्र करते रहते हैं। वह भूल जाता है कि उसके सामने काल खड़ा है जो दिन-रात बीतने के साथ उसकी आयु का हरण करता जा रहा है। उसे न तो धीरे-धीरे हो रही अपनी आयु-क्षय दिखती है और न उसे यमराज की ही परवाह रहती है जो पीछे से उसे मारने का प्रयत्न करते रहते हैं। तुम यह समझने का प्रयास करो कि तुम अत्यन्त शोचनीय स्थिति में हो और चारों ओर से संकट से घिरे हुए हो।
 
O King, a woman is like a flower which is very attractive in the beginning and becomes very repulsive in the end. A living being is entangled with a woman due to sexual desires and he enjoys sexual pleasure in the same way as one enjoys the fragrance of flowers. Thus he lives a life of sense gratification from the tongue to the penis and thus the living being considers himself very happy in domestic life. While living with his wife he is always engrossed in such thoughts. He enjoys listening to the conversations of his wife and children. These are like the sweet humming of the bees which keep collecting honey from each flower. He forgets that death is standing before him, which is taking away his life with the passing of days and nights. He neither sees the slow decline of his life nor is he concerned about Yamaraja who keeps trying to kill him from behind. You try to understand this. You are in a very pitiable situation and are surrounded by troubles on all sides.
तात्पर्य
भौतिकवादी जीवन कृष्ण के शाश्वत सेवक के रूप में अपनी संवैधानिक स्थिति को भूलने का मतलब है, और यह विस्मृति विशेष रूप से गृहस्थ-आश्रम में बढ़ाया जाता है। गृहस्थ-आश्रम में एक जवान आदमी एक युवा पत्नी को स्वीकार करता है जो शुरुआत में बहुत खूबसूरत है, लेकिन समय बीतने के साथ, कई बच्चों को जन्म देने और बूढ़ा होने के बाद, वह पूरे परिवार को बनाए रखने के लिए पति से कई चीजों की मांग करती है। ऐसे समय में पत्नी उसी आदमी के लिए घृणित हो जाती है जिसने उसे अपने छोटे दिनों में स्वीकार किया था। गृहस्थ-आश्रम से दो कारणों से ही लगाव होता है: पहला पत्नी अपने पति की जीभ को संतुष्ट करने के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाती है, और दूसरा वह उसे रात में यौन सुख देती है। गृहस्थ-आश्रम से जुड़ा हुआ व्यक्ति हमेशा इन दो चीजों के बारे में सोच रहा है - स्वादिष्ट भोजन और यौन सुख। पत्नी की बातें, जो एक पारिवारिक मनोरंजन के रूप में आनंदित होती हैं, और बच्चों की बातें दोनों सजीव संस्था को आकर्षित करती हैं। वह इस प्रकार भूल जाता है कि उसे किसी दिन मरना है और यदि वह एक योग्य शरीर में रखा जाना चाहता है तो अगले जीवन की तैयारी करनी है। फूलों के बगीचे में हिरन राजा को इंगित करने के लिए महान ऋषि नारद द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक रूपक है कि राजा खुद भी ऐसे परिवेश में फंसा हुआ है। वास्तव में हर कोई इस तरह के पारिवारिक जीवन से घिरा हुआ है, जो भ्रामक है। इस प्रकार जीव यह भूल जाता है कि उसे घर लौटना है, भगवान के पास। वह बस पारिवारिक जीवन में उलझ जाता है। इसलिए प्रह्लाद महाराज ने इशारा किया है, हित्वात्मा-पाटं गृहम अंध-कूपं वनं गतो यद धरिम आश्रयेत। पारिवारिक जीवन को एक अंधे कुएं (अंध-कूपम) के रूप में माना जाता है जिसमें एक व्यक्ति गिर जाता है और बिना सहायता के मर जाता है। प्रह्लाद महाराज ने सिफारिश की कि जब किसी की इंद्रियां होती हैं और वह काफी मजबूत होता है, तो उसे गृहस्थ-आश्रम छोड़ देना चाहिए और वृंदावन के जंगल में जाकर भगवान के चरण-कमलों का आश्रय लेना चाहिए। वैदिक सभ्यता के अनुसार, एक व्यक्ति को एक निश्चित उम्र (पचास वर्ष की आयु) में पारिवारिक जीवन त्यागना पड़ता है, वानप्रस्थ लेना पड़ता है और अंततः एक संन्यासी के रूप में अकेला रहना पड़ता है। वैदिक सभ्यता की निर्धारित विधि यही है जिसे वर्णाश्रम-धर्म के रूप में जाना जाता है। जब कोई पारिवारिक जीवन का आनंद लेने के बाद संन्यास लेता है, तो वह सर्वोच्च भगवान विष्णु को प्रसन्न करता है। पारिवारिक या सांसारिक जीवन में किसी को अपनी स्थिति को समझना होगा। उसे बुद्धिमत्ता कहा जाता है। जीभ और जननांगों को एक पत्नी के साथ संतुष्ट करने के लिए किसी को हमेशा पारिवारिक जीवन में नहीं फंसे रहना चाहिए। इस तरह, एक व्यक्ति केवल अपने जीवन को बर्बाद कर देता है। वैदिक सभ्यता के अनुसार, यदि आवश्यक हो तो बलपूर्वक, एक निश्चित अवस्था पर परिवार को त्यागना अनिवार्य है। दुर्भाग्य से, वैदिक जीवन के तथाकथित अनुयायी जीवन के अंत में भी अपने परिवार को नहीं छोड़ते हैं, जब तक कि मृत्यु के द्वारा उन पर बल न दिया जाए। सामाजिक व्यवस्था का पूरी तरह से ओवरहाल होना चाहिए, और समाज को वैदिक सिद्धांतों, अर्थात् चार वर्णों और चार आश्रमों में वापस जाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)