श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  4.29.53 
क्षुद्रं चरं सुमनसां शरणे मिथित्वा
रक्तं षडङ्‌घ्रिगणसामसु लुब्धकर्णम् ।
अग्रे वृकानसुतृपोऽविगणय्य यान्तं
पृष्ठे मृगं मृगय लुब्धकबाणभिन्नम् ॥ ५३ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा जी, उस हरिण की खोज करो जो एक सुंदर बगीचे में अपनी हिरनी के साथ घास चरने में मस्त है। वह हरिण अपने काम (चरने) में इतना लिप्त है कि उसे यह पता ही नहीं है कि उसके सामने एक बाघ खड़ा है, जो दूसरों का मांस खाकर खुद को जिंदा रखता है। हिरण के पीछे एक शिकारी खड़ा है जो उसे तीखे बाणों से मार डालना चाहता है। इस तरह हिरण की मृत्यु निश्चित है।
 
O king, look for the deer who is happily grazing with his doe in a beautiful garden. The deer is deeply absorbed in his work (grazing) and is enjoying the sweet humming of the bees in the garden. Try to understand his situation. He does not know that in front of him is a wolf who is used to feeding himself by eating the flesh of others. Behind the deer is a hunter who is ready to pierce him with sharp arrows. Thus the death of the deer is certain.
तात्पर्य
यहाँ एक रूपक है जिसमें राजा को एक ऐसे हिरण को खोजने की सलाह दी जाती है जो हमेशा ख़तरे की स्थिति में रहता है। हालाँकि चारों तरफ़ से ख़तरा होता है, हिरण असावधान होकर एक सुंदर पुष्प वाटिका में घास चरता रहता है, अपने चारों ओर के ख़तरे से अनजान। सभी जीवित संस्थाएँ, ख़ासकर मनुष्य, अपने परिवारों के साथ बहुत खुश होते हैं। मानो कोई फूलों के बगीचे में रह रहा हो और भौंरों की मीठी गुनगुनाहट सुन रहा हो, हर कोई अपनी पत्नी पर केंद्रित होता है, जो पारिवारिक जीवन की सुंदरता है। भौंरों की गुनगुनाहट को बच्चों की बातचीत से जोड़ा जा सकता है। हिरण की तरह ही, मनुष्य अपने परिवार का आनंद उठाता है, यह जाने बिना कि उसके सामने समय का कारक है, जिसका प्रतिनिधित्व बाघ द्वारा किया जाता है। एक जीवित संस्था की फलदायी गतिविधियाँ केवल एक और ख़तरनाक स्थिति पैदा करती हैं और उसे विभिन्न प्रकार के शरीर को स्वीकार करने के लिए बाध्य करती हैं। रेगिस्तान में पानी के मृगतृष्णा के पीछे एक हिरण के लिए दौड़ना असामान्य नहीं है। हिरण को सेक्स का भी बहुत शौक होता है। निष्कर्ष यह है कि जो एक हिरण की तरह रहता है वह नियत समय आने पर मारा जाएगा। इसलिए वैदिक साहित्य सलाह देते हैं कि हमें अपनी संवैधानिक स्थिति को समझना चाहिए और मृत्यु आने से पहले भक्ति सेवा लेनी चाहिए। भागवतम (11.9.29) के अनुसार:

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहु-संभवान्‍ते

मानुषमर्थदमनित्यमपीहधीरः

तूर्णं यतेतनपतेदनुमृत्युयावन

निःश्रेयसायविषयःखलुसर्वतःस्यात्

कई जन्मों के बाद हमने यह मानवीय रूप प्राप्त किया है; इसलिए मृत्यु आने से पहले, हमें स्वयं को प्रभु की प्रेममयी सेवा में संलग्न करना चाहिए। यही मानव जीवन की परिपूर्णता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)