श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  4.29.51 
स वै प्रियतमश्चात्मा यतो न भयमण्वपि ।
इति वेद स वै विद्वान्यो विद्वान्स गुरुर्हरि: ॥ ५१ ॥
 
 
अनुवाद
जो भक्ति में संलग्न है, उसे इस भौतिक अस्तित्व में जरा सा भी डर नहीं लगता। इसका कारण यह है कि सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान सुपरसोल और सभी के मित्र हैं। जो इस रहस्य को जानता है, वह वास्तव में शिक्षित है और ऐसा शिक्षित व्यक्ति दुनिया का आध्यात्मिक गुरु बन सकता है। जो वास्तव में एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु है, कृष्ण का प्रतिनिधि है, वह कृष्ण से भिन्न नहीं है।
 
One who is engaged in devotion is not afraid of this world in the least. The reason for this is that the Supreme Personality of Godhead is the Supreme Soul and the friend of all. He who knows this secret is truly enlightened and only such an enlightened person can be the Guru of the world. He who is actually a bona fide Guru, that is, a representative of Krishna, is one with Krishna.
तात्पर्य
श्रीला विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं, साक्षाद् धृतेन समस्त-शास्त्रैर उक्तस्तथा भाव्यते एव सदद्भि: - हर धर्म ग्रंथ में आध्यात्मिक गुरु को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रतिनिधि के रूप में वर्णित किया गया है। आध्यात्मिक गुरु को सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान के समान माना जाता है क्योंकि वह भगवान का सबसे भरोसेमंद सेवक (किन्तु प्रभोर यः प्रिय एव तस्य) होता है। इसका आशय यह है कि हर किसी के लिए परमात्मा और जीव बहुत ही प्रिय होते हैं। हर कोई अपने आप से प्यार करता है, और जब वह अधिक उन्नत हो जाता है, तो वह परमात्मा से भी प्यार करता है। एक आत्म-साक्षात् व्यक्ति किसी और की पूजा करने की सलाह नहीं देता है सिवाय परमात्मा के। वह जानता है कि सर्वोच्च व्यक्ति ईश्वर की पूजा करना विभिन्न देवताओं की पूजा करने से आसान है, वासना और भौतिक सुख की इच्छा के प्रभाव में। इसलिए भक्त हमेशा प्रभु की प्रेमपूर्ण भक्ति सेवा में लगे रहते हैं। ऐसा व्यक्ति एक सच्चा गुरु होता है। पद्म पुराण में कहा गया है:

षट्-कर्म-निपुणो विप्रो

मंत्र-तंत्र-विशारदः

अवैष्णवो गुरुर्न स्याद्

वैष्णवः श्व-पचो गुरुः

"यदि कोई ब्राह्मण भी वैदिक शास्त्रों में बहुत ही विद्वान है और ब्राह्मण के छह प्रमुख कर्तव्यों को जानता है, तो भी वह तब तक एक गुरु, या आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता जब तक वह सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान का भक्त नहीं है। हालाँकि, अगर कोई कुत्ते खाने वाले परिवार में पैदा हुआ है, लेकिन भगवान का एक शुद्ध भक्त है, तो वह एक आध्यात्मिक गुरु बन सकता है।" निष्कर्ष यह है कि जब तक कोई प्रभु का शुद्ध भक्त नहीं बन जाता, तब तक वह आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता। जो ऊपर दिए गए भक्ति सेवा के विवरण के अनुसार आध्यात्मिक गुरु है, उसे सर्वोच्च व्यक्ति ईश्वर के रूप में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित समझा जाना चाहिए। यहाँ वर्णित शब्दों के अनुसार (गुरु हरि), एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु से परामर्श करने का अर्थ है व्यक्तिगत रूप से सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान से परामर्श करना। इसलिए ऐसे एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु की शरण लेनी चाहिए। जीवन में सफलता का मतलब है एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु को स्वीकार करना जो कृष्ण को एकमात्र सर्वोच्च प्रिय व्यक्तित्व के रूप में जानता है। भगवान के ऐसे विश्वासपात्र भक्त की पूजा करनी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)