श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  4.29.50 
हरिर्देहभृतामात्मा स्वयं प्रकृतिरीश्वर: ।
तत्पादमूलं शरणं यत: क्षेमो नृणामिह ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीहरि इस संसार में देहधारी जीवों की आत्मा और मार्गदर्शक हैं। वे प्रकृति की समस्त भौतिक गतिविधियों के परम नियंत्रक हैं। वे हमारे सर्वश्रेष्ठ मित्र भी हैं, इसलिए हर व्यक्ति को उनके चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए। ऐसा करने से जीवन शुभ होगा।
 
Lord Sri Hari is the Supreme Being and the protector of all living beings in this world. He is the ultimate controller of all the physical activities of nature. He is also our best friend, so everyone should take refuge in His lotus feet. By doing so, life will become prosperous.
तात्पर्य
भगवद्गीता (18.61) में कहा गया है, ईश्वरः सर्व-भूतानां हृद-देशेऽर्जुन तिष्ठति: "हे अर्जुन, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थित है।" जीव शरीर के भीतर है, और परमात्मा, भगवान का परम व्यक्तित्व भी वहाँ है। उन्हें अन्तर्यामी और चैत्य-गुरु कहा जाता है। जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता (15.15) में कहा है, वे सब कुछ नियंत्रित कर रहे हैं:

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो

मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च

"मैं सबके हृदय में विराजमान हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति आती है।"

शरीर के भीतर परमात्मा द्वारा ही हर चीज का निर्देशन किया जा रहा है; इसलिए शौर्य का श्रेष्ठ भाग उनके निर्देशन को लेना और खुश रहना है। उनका निर्देशन लेने के लिए, किसी को भक्त होने की आवश्यकता है, और यह भगवद्गीता (10.10) में भी पुष्टि की गई है:

तेषां सतत-युक्तानां

भजतां प्रीति-पूर्वकम्

ददामि बुद्धि-योगं तं

येन मामुपयान्ति ते

"जो लगातार भक्त हैं और प्रेम से मेरी पूजा करते हैं, मैं उन्हें वह समझ देता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।"

हालांकि परमात्मा हर किसी के हृदय में हैं (ईश्वरः सर्व-भूतानां हृद-देशेऽर्जुन तिष्ठति), वे केवल शुद्ध भक्तों से बात करते हैं जो लगातार उनकी सेवा में लगे रहते हैं। चैतन्य-भागवत (अन्त्य 3.45) में कहा गया है:

ताहारे से बलि विद्या, मंत्र, अध्यायन

कृष्ण-पाद-पद्मे ये कराये स्थिर मन

"जिसने अपने मन को कृष्ण के चरण कमलों में स्थिर कर लिया है, उसे सर्वोत्तम शिक्षा प्राप्त करने वाला और सभी वेदों का अध्ययन करने वाला समझा जाना चाहिए।" चैतन्य-भागवत में अन्य उपयुक्त उद्धरण भी दिए गए हैं:

से से विद्यारा फल जानिह निश्चय

कृष्ण-पाद-पद्मे यदि चित्त-वृत्ति राय

"शिक्षा का परिपूर्ण परिणाम कृष्ण के चरण कमलों में मन को स्थिर करना है।" (आदि 13.178)

‘दिग-विजय करिबा,’ — विद्यारा कार्य नहे

ईश्वरे भजिले, से विद्या ‘सत्य’ कहे

"भौतिक शिक्षा के माध्यम से दुनिया को जीतना वांछनीय नहीं है। यदि कोई भक्ति सेवा में लग जाता है, तो उसकी शिक्षा पूर्ण हो जाती है।" (आदि 13.173)

पड़े केने लोका — कृष्ण-भक्ति जानिबारे

से यदि नहिला, तबे विद्याय की करे

"शिक्षा का उद्देश्य कृष्ण और उनकी भक्ति को समझना है। यदि कोई ऐसा नहीं करता है, तो शिक्षा झूठी है।" (आदि 12.49)

ताहारे से बलि धर्म, कर्म सदाचार

ईश्वरे से प्रीति जन्मे सम्मत सबार

"संस्कारी, शिक्षित, बहुत सक्रिय और धार्मिक होने का अर्थ कृष्ण के लिए स्वाभाविक प्रेम का विकास करना है।" (अन्त्य 3.44) कृष्ण के लिए सभी के हृदय में प्रेम सुप्त है, और संस्कृति और शिक्षा से उसे जगाना होता है। यही कृष्ण चेतना आंदोलन का उद्देश्य है। एक बार भगवान चैतन्य ने श्री रामांनंद राय से पूछा कि शिक्षा का सबसे अच्छा हिस्सा क्या है, और रामांनंद राय ने उत्तर दिया कि शिक्षा का सबसे अच्छा हिस्सा कृष्ण चेतना में प्रगति है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)