हे राजन, संपूर्ण जग कुश के तीखे अग्र भाग से आच्छादित है, और इसके कारण तुम अहंकारी हो गए क्योंकि तुमने अनेक यज्ञों में भिन्न-भिन्न प्रकार के पशुओं का वध किया। अपनी मूर्खता के कारण तुम नहीं जानते कि भगवान् को प्रसन्न करने का एकमात्र उपाय भक्ति है। तुम इस तथ्य को समझ नहीं सकते। तुम्हें केवल ऐसे ही कार्य करने चाहिए जिनसे भगवान् प्रसन्न हों। हमारी शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे हम कृष्णचेतना के स्तर तक ऊपर उठ सकें।
O King, the entire world is covered with the sharp edges of the kusha grass and therefore you have become proud because you have killed many kinds of animals in sacrifices. Due to your foolishness you do not know that the only way to please the Lord is through devotion. You cannot understand this fact. You must perform only those activities which please the Lord. Our education should be such that we can rise to the level of Krishna consciousness.
तात्पर्य
इस श्लोक में महान ऋषि नारद मुनि राजा का सीधे तौर पर अपमान करते हैं क्योंकि राजा कई जानवरों की हत्या के अनुष्ठान कर रहे थे। राजा सोच रहा था कि वह बहुत महान है क्योंकि उसने कई यज्ञ किए हैं, लेकिन महान ऋषि नारद उसे सीधे उलाहना देते हैं और बताते हैं कि उसकी पशु-हत्या सिर्फ झूठी प्रतिष्ठा से उसे घमंडी बना रही है। जो कुछ भी कृष्ण भावना की प्राप्ति की ओर नहीं ले जाता है, वह वास्तव में एक पापपूर्ण कार्य है, और जिस शिक्षा से कृष्ण की समझ प्राप्त न हो, वह झूठी शिक्षा है। यदि कृष्ण भावना का अभाव है, तो व्यक्ति केवल झूठी गतिविधियों और झूठी शैक्षिक खोजों में लगा रहता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥