याम् इमां पुष्पितां वाचं
प्रवदन्त्य विपश्चितः
वेद-वाद-रताः पार्थ
नान्यदस्तीतिवादिनः
कामात्मानः स्वर्ग-परा
जन्म-कर्म-फल-प्रदाम
क्रिया-विशेष-बहुलां
भोगैश्वर्य-गतिं प्रति
"जो लोग वेदों के पुष्पित वाक्यों से अति आसक्त रहते हैं, जो स्वर्ग के लोक में जाने के लिए अनेक प्रकार के कर्मकांडों का समर्थन करते हैं और जो अच्छे जन्म, शक्ति आदि फल देने वाले कर्मों को ही सब कुछ समझते हैं, वे लोग अल्पज्ञ हैं। कामनाओं और सुख-सुविधाओं में आसक्त मन वाले और इन्द्रिय-तृप्ति के लिए उत्सुक पुरुष स्वर्ग की प्राप्ति को ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य मानते हैं। इसलिए वे यह कहते हैं कि शरीर-भोग से बढ़कर कुछ नहीं है।"
सामान्य रूप से लोग वेदों में बताए गए नित्य कर्मकांडों से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। बृहस्पति की तरह यज्ञ करने के द्वारा स्वर्गालोक में ऊपर उठने के लिए वे बहुत आतुर होते हैं। श्री नारद मुनि ने बृहस्पति को ऐसे नित्य कर्मकांडों में संलग्न होने से रोकना चाहा था। इसलिए वे अब उनसे सीधे कह रहे हैं, "ऐसे अस्थायी लाभों में मत उलझो।" आजकल की सभ्यता में लोग विज्ञान के तौर-तरीकों से भौतिक प्रकृति के संसाधनों का दोहन करने में बहुत रुचि रखते हैं। वास्तव में, यह उन्नति मानी जाती है। यद्यपि, यह वास्तव में उन्नति नहीं है, बल्कि केवल सुनने में सुहावना है। यद्यपि हम ऐसे काल्पनिक तरीकों से उन्नति कर रहे हैं, लेकिन हम अपने वास्तविक उद्देश्य को भूल रहे हैं। इसलिए भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं, जड़-विद्या यत मायारा वैभव तोमार भजने बाधा: "भौतिकवादी अध्ययन केवल माया का दिखावा भरा जाल है, क्योंकि वे आध्यात्मिक प्रगति में बाधा डालते हैं।"
इस धरती पर या अन्य ग्रहों पर अनुभव की गई जीवन की अस्थायी सुख-सुविधाओं को भ्रामक ही समझना चाहिए क्योंकि वे जीवन के वास्तविक उद्देश्य को नहीं छूतीं। जीवन का वास्तविक उद्देश्य है ईश्वर के परमधाम को लौटना। जीवन के वास्तविक उद्देश्य को न जानते हुए लोग या तो स्थूल भौतिकवादी कार्यों या अनुष्ठान संबंधी कर्मों से जुड़ जाते हैं। यहाँ पर राजा बृहस्पति से अनुरोध किया जाता है कि वे ऐसे कार्यों से जुड़े न रहें। वेदों में कहा गया है कि यज्ञ ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। भारतीय जनसंख्या का एक वर्ग जो आर्य-समाजवादी के रूप में जाना जाता है, वेदों के यज्ञ संबंधी भाग पर बहुत अधिक जोर देता है। यद्यपि, यह श्लोक इंगित करता है कि ऐसे यज्ञों को भ्रामक माना जाना चाहिए। वास्तव में मानव जीवन का उद्देश्य ईश्वर-साक्षात्कार या कृष्णभावना होनी चाहिए। बेशक, वैदिक क्रियाकलाप बहुत शानदार होते हैं और उनके बारे में सुनकर अच्छा लगता है, लेकिन वे जीवन के वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते हैं।
